चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Thursday, April 12, 2012

भूल जाईये बीते कल को आगे बढ़ना ही नियति है...




कृपया क्षमा करें कुछ मित्रों को मुझे परेशान देख बहुत दुख हुआ। रोना धोना और चिल्लाना मेरी यह फ़ितरत भी नही अतः यह कविता यहाँ से हटा रही हूँ...

Wednesday, March 28, 2012

सागर में दो दिन डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय में...


दोस्तों कुछ समय पहले  ( 15 जनवरी  2012) डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय में एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में शिरकत करने का मौका मिला। कुछ व्यस्तता थी अतः पहले पोस्ट नही कर पाई।

कवियों की इस जमात में जाने-माने दिग्गज विद्यमान थे.. सबसे बीच में जो नजर आ रहे हैं वे सोम ठाकुर जी हैं और कुर्सी  पर विट्ठल भाई पटेल और सबसे पहले अलबेला जी के साथ मै।







विट्ठल भाई पटेल जी के बारे में जितना कहा जाये कम होगा।




ये है विट्ठल भाई की तस्वीरें जो उनकी गाथा खुद गा रही हैं...

विट्ठल भाई पटेल जी के यहाँ सचमुच बहुत अच्छा लगा एक ऎसी शख्सियत जिसे कोई भुला नही सकता




अंत में अलबेला जी तथा हरी सिंह गौर युनिवर्सिटी के सचिव संतोष तिवारी सहगोरा जी का आभार जिन्होनें मुझे इस आयोजन में हिस्सा लेने का अवसर प्रदान किया।

सुनीता शानू

Friday, January 20, 2012

चाय चाय चाय ! और कोई काम ही नही.?

यह है चाय....

बहुत दिन से सभी एक ही शिकायत कर रहे हैं शानू जी कुछ लिखते ही नही आप और मुझे... सच्ची में चाय के अलावा कुछ काम नही। सारे दिन इसको चाय भिजवानी है उसको भिजवानी है चाय की टेस्टिंग करनी है। अपुन तो पगला गये। मेरा ब्लॉग भी आजकल गाना गा रहा है सूना-सूना लागे.... पर मै भी क्या करूँ ये चाय मुझसे तो छूटती ही नही.. हाहहह आप पक्का मुझे चाय की नशेड़ी बोल देंगें:) 

खैर पच्चीस दिसम्बर को पिलानी में कवि सम्मेलन हुआ। 

सबसे खूबसूरत बात तो यह थी की उस कवि सम्मेलन में मेरे माता-पिता को सादर-सम्मान पूर्वक बुलाया गया था। मेरे लिये इससे बड़ी बात कोई नही थी। कवि सम्मेलन तो बहुत हुए लेकिन मेरे माता-पिता का होना मेरे लिये सबसे बड़ी बात थी।

पिलानी बहुत ही खूबसूरत शहर है। पिलानी मेरी जन्म-भूमि जहाँ मै पली बड़ी हुई  और आज भी मन अटका है मेरी पिलानी में। जब कभी जाना होता है ट्रेन से लेकर घर तक सब  अनजाने चेहरे भी जाने-पहचाने लगने लगते हैं। 

आईये आज थोड़ी बहुत पिलानी की सैर कर ही ली जाये...

यह सरस्वती मंदिर का मुख्य द्वार है
अरे रे यह हाथी को देख कर यह मत समझ लीजियेगा की हम मायावती का समर्थन कर रहे हैं। ऎसे तो हाथों पर दस्ताने भी नही हैं भई कांग्रेस का समर्थन भी तो नही न है....:)


मै इन जनाब की चाची हूँ और यह खड़े हैं शिव-गंगा मंदिर के सामने

बहुत ही खूबसूरत जगह है यह शिव-गंगा नहर जो एक बार चला जाये बार-बार जाने का मन हो जायेगा।

हर्षवर्धन बिड़ला जी और मै...
पिलानी का नाम पहले दलेल गढ़ था सुना है कि पिलानी नाम बिड़लो का ही दिया गया है। बिड़ला जी ने वैसे पिलानी की रूपरेखा ही बदल दी है।  मुझे तो बस इतना याद है कि हर्षवर्धन बिड़ला जी की हवेली में हम छुपछुपाई खेला करते थे...जब मै दस साल की थी...:)

कड़ाके की ठण्ड और हम बेचारे कवि...:)
कवियों की दशा क्या आपसे छुपी हुई है। इतनी तेज़ ठण्ड में स्टेज़ पर बैठा देना।  ऎसे में क्या कविता निकलती है? अब बताओ ये अलबेला जी न होते तो इन बीच वाले कवियों का क्या होता। मै तो क्या है पिलानी की हूँ इतनी सर्दी नही लगती भई लेकिन जो बाहर से आये थे...कुछ तो सोचो उनके बारे में...

लो जी तस्वीर देख कर ही आप सब समझ गये होंगे... अब जरा एक कप चाय हो जाये.. 

सुनीता शानू
  

Saturday, September 17, 2011

मन को मनाने के अंदाज निराले है


बस एक छोटी सी कोशिश...


मन को मनाने के अंदाज निराले है
हुए नही वो हम ही उसके हवाले हैं

उसने कसम दी तो न पी अभी तक
हाथ में पकड़े लो खाली प्याले है

दिल की बात जुबां पर लाये भी कैसे
ये भीड़ नही बस उसके घरवाले हैं

बात छोटी सी भी वो समझे नही
चुप रहेंगे भला जो कहने वाले हैं

इन्तजार की भी होती है हद दोस्तों
रूक न पायेंगे हम जो मतवाले हैं॥


सुनीता शानू

Sunday, August 7, 2011

तनहाई में अक्सर हमें वो याद आते हैं



ऎसे ही लिख डाली बैठे ठाले..आप भी पढ़ लो बैठे ठाले जी... इस मुई ब्लॉगिंग ने रात के दो बजा दिये...:( ये सब दोस्त लोगों की जिद की वजह से हुआ है...कुछ लिखो कुछ लिखो बस...चलिये शुभरात्री..

जो पास होते हैं वही जब दूर जाते हैं
तनहाई में अक्सर हमें वो याद आते हैं
भीड़ में कोई ही लगता है अपना सा
सभी नज़रों मे कब अपनी समाते हैं


मुझे देख कर उसका सीटी बजा देना
कोई गीत फ़िल्मी अक्सर गुनगुना देना
अकेली देख कर मेरा दुप्पटा उड़ा देना
अकेले में ख्याल सारे गुदगुदाते हैं
तनहाई में अक्सर हमे वो याद आते हैं।


कहा था उसने कि मै खूबसूरत हूँ
प्रेम में लिपटी अजंता की मूरत हूँ 
दीवानगी में जब कभी मुस्कुराती हूँ
देख कर आईने भी कई टूट जाते है
तनहाई में अक्सर हमें वो याद आते हैं।


चाँद को देखूं तो चाँदनी दिल जलाती है
उसका नाम ले लेकर सखियां सताती हैं
और नींद भी आंखों से जब रूठ जाती है
रात भर ख्वाबों में वही तो आते जाते है
तनहाई में अक्सर हमें वो याद आते हैं।


बचपन में बनाये उस घरौंदे की कसम
पेड़ से तोड़ी कच्ची इमली की कसम
जो साथ खेले थे इक्का दुक्का हम
आज भी वो नीम पीपल बरगद बुलाते है
तनहाई में अक्सर हमें वो याद आते हैं।


Monday, July 18, 2011

चलो एक हॉस्य हो जाये




वैसे तो कुछ दिन से तबीयत ठीक नही फ़िर भी सोचते हैं आपको अपने साथ-साथ क्यों रूलायें थोड़ा हम भी हँस लें, थोड़ा आपको भी हँसाये...:)

शीर्षक है मुहावरों की मार( कविता का नायक है प्रभुदयाल, आज प्यारेलाल छुट्टी पर गया हुआ है)

बात-बात पर प्रभुदयाल
खाता था मार
जबसे मुहावरों का
चढ़ा उसे बुखार,
करता क्या बेचारा
आफ़त का था मारा
रिक्शा चलाता था
दो जून की रोटी भी
मुश्किल से कमाता था
बढ़ते-बढ़ते बढ़ गया
मकान का किराया
कर्ज बन कर चढ़ गया,
तंग आकर सेठजी ने बुलाया
सिर पर पाँव रख प्रभु
दौड़ा-दौड़ा आया

क्यों भई प्रभु
क्या कर रहा है
मालूम भी है तुझपे
किराया कितना चढ़ रहा है
प्रभु बोला सेठजी
क्या बतलाऊँ
दाल-रोटी का जुगाड
मुश्किल से कर पाता हूँ
आजकल परिवार को
यही खिला पाता हूँ
सेठजी गुस्साये...
जोर से चिल्लाये
क्या बे!
नब्बे रूपये किलो की दाल खाता है
पैसे नही हैं कहकर उल्लू बनाता है
प्रभु बेचारा
अपनी ही बात में फ़ंस गया
जीभ को जैसे साँप डस गया
फ़िर भी साहस जुटा कर
बोला
अन्नदाता माईबाप
मेरा कुसूर बतलायें आप?
ये तो है प्रभु की माया
वरना मुझ गरीब ने
 क्या था कमाया...
सेठजी गुस्से से हो गये लाल
चिल्लाये..
ओ नमकहराम प्रभुदयाल
माया का नाम लेते शर्म नही आती
जिस थाली में खाया
उसी में छेद किया
मालकिन का नाम भी
तूने बेअदबी से लिया
प्रभु आफ़त का मारा
फ़िर पिट गया बेचारा

अब तो प्रभु ने
हाथ जोड़ दिये
पाँव पकड़ लिये
पर सेठजी अडे रहे
अपनी बात पर डटे रहे
प्रभु ने भी हार न मानी
बात मनवाने की ठानी

सेठजी के पास आकर
बोला फ़ुस्फ़ुसाकर
सेठजी काहे बात बढ़ा रहे हैं
मुझ गरीब से मुँह लड़ा रहे हैं,
आप शान्ति के साथ बैठकर भी
कर सकते हैं बात
अब तो सेठजी
शर्म से हो गये लाल
कहीं सेठानी न कर दे बवाल
जब खुलने लगी पोल
बोले प्रभु धीरे से बोल
नौकरानी से बात करवायेगा
खुद पिटेगा मुझे भी पिटवायेगा

प्रभु जोर से बोला
सरकार...
अपनी जान बचाइये
सेठानी सब सुन रही है
भाग जाईये...
अबके सेठानी ने
जोर की लात जमाई
सेठ के साथ हो गई
प्रभु की भी पिटाई
भागते-भागते चिल्लाया
लो आज तो
चने  के साथ घुन भी पिस गया।

Thursday, July 14, 2011

दुनिया बदलने की खबर



कहीं सुनी तो होगी
कहकहों के शोर में
किसी के सिसकने की आवाज
तेज़ हँसी के बीच किसी की
खामोश मुस्कुराहट
कहीं दूर जब
कोई सितारा टूटता होगा
मचलती होंगी सैंकड़ो ख्वाहिशें
लेकिन
नहीं होगा अहसास उसकी
टूटन का
कहीं घुट गई होगी चीख
किसी अजन्मे की
गर्भ में ही
या फ़िर
सियारों के शोर और
कूड़े के ढेर में दबकर
रह गया होगा
क्रंदन किसी
नाज़ायज या नामुराद का
कब सोचा होगा
किसी ने
बहलाते,फुसलाते,सहलाते
हैवानियत के ये हाथ
रौंद देंगे किसी
मासूम का बचपन
या किसी गुनहगार की
बुलंद आवाज के नीचे
दब कर रह गई होगी
किसी बेगुनाह की बेगुनाही
कहीं सुना तो होगा
तोड ली गई कलियाँ
भून डाला तंदूर में
हँसता, खिलखिलाता
बचपन
क्या शीशे सी पिघल रही है
कानों में
एक ओर कसाब के
जन्म की किलकारियाँ
सुन भी रही है
तेज़ धमाकों में
आतंक के नाचने-गाने की धुन
क्यों हो रहा है शोर
चिथड़े-चिथड़े होती
मानवता का
क्यों नहीं सुनाई पड़ रही कहीं
दुनिया बदलने की खबर...

Thursday, July 7, 2011

बूढा है की मरता ही नही।




पँचवटी पिलानी राजस्थान
वास्तविकता पर आधारित एक प्रकाशित रचना...




आज सब कुछ
बदला-बदला सा है,
उन रोती बिलखती आँखों में
नही है अंगारे
उन होठों पर
गाली भी नही है
हाँ दर्द झलक रहा है
दुनिया भर का दर्द
कि कैसे जीयेंगे हम
इन बच्चों का क्या होगा
हाय बाबूजी
हमे अनाथ कर गये
चीखे हवा में
कलाबाजियाँ खाने लगी
कि हवा भी
आदमी के दोगलेपन से
बरगलाने लगी
बूढ़ा मरता क्यूँ नही
खाँसता रहता है रात भर
न दिन में चैन
न रात मे आराम
बच्चे भी परेशान
हे भगवान ये
कब जायेगा शमशान
जाने क्यों समझता ही नही
बूढ़ा मरता ही नही....।

Thursday, June 30, 2011

अठन्नी तो बचाओ (चवन्नी प्रकरण)



सुबह-सुबह की खबर पर
पड़ी जब नज़र
प्यारे ने पुकारा
प्रभु! तेरा ही सहारा...
आज संसार का तुमने
क्या हाल कर दिया
मंहगाई को जवान
और
प्याज को बदनाम कर दिया

कितने सुखी थे हम
इकन्नी दुअन्नी के जमाने में
एक उम्र बीत गई थी
चवन्नी कमाने में
आज उसी चवन्नी को
कर दिया आऊट
क्या आयकर विभाग को था
मेरी चवन्नी पर डाऊट?

हे सर्वशक्तिमान
कोई उपाय बतलायें
सरकारी चंगुल से मेरी
चवन्नी को छुड़वायें...

सुनकर प्यारे की चिल्ल पौं
पत्नी दौड़ी आई
तुमको भी न प्यारे जी
कभी अकल न आई
बेवजह इतना चिल्लाते हो
सुबह सुबह बेचारे
पडौसियों को जगाते हो...

सुनकर पत्नी की फ़टकार
प्यारे लाल बोले
सुनो मेरी सरकार
क्या जमाना आ गया
मेरी चवन्नी को ही
खा गया...

पत्नी बोली प्यारे जी
चवन्नी तो जाने कब से
खो गई थी बाज़ारों में
लुटते-लुटते लुट गई थी
भिखमंगों की कतारों में
और अब तो
भिखमंगो ने भी पल्लू छुड़ा लिया
जाने कबसे
सम्पूर्ण चवन्नी को ही गटका लिया

चवन्नी का तो बस
रह गया था नाम
अस्तित्व तो कबका
सिमट गया श्रीमान...

प्यारे हुए परेशान बोले भाग्यवान
चवन्नी भर की चवन्नी ने
कितनी दौड़ लगवाई थी
तब जाके एक चवन्नी
अपनी जेब में आई थी।
इस छोटी सी चवन्नी ने
कितनों को बना दिया
चवन्नी छाप
कैसे भूल गई हैं
 इसकी गरिमा को आप?

रोते हुए प्यारे को
पत्नी ने समझाया
चवन्नी खोने का गम
है उसे भी बतलाया

जो होना था हुआ प्यारे मोहन
खुद को अब समझाओ
हो सके तो अपनी
अठन्नी को बचाओ...


सुनीता शानू


Thursday, March 17, 2011

तुम्हारे बगैर



मुश्किल होगा
तुम्हारे बिन जीना
कल्पना करना भी
पाप होगा शायद
तुम जानते हो सब...
बच्चों की कसम भी
खा गई थी वो...

आँखों में आँसू
दिल में हलचल कि
कैसे कटेगी
वासंती उम्र
कैसे पूरी होंगी
तमाम ख्वाहिशे
तुम्हारे बगैर...

किन्तु,परन्तु सभी शब्दों ने
झकझोर कर रख दिया
कि अचानक
किसी ने
कंधा थपथपाया

जाने वाले के साथ भी
भला कोई जाता है।
तुम्हे जीना ही होगा
खुद के लिये
सँवरना ही होगा
और
दायित्व की जंजीरों ने
जकड़ लिया
इस कदर कि
खा गई वह
फ़िर एक बार
बच्चों की कसम
जी ही लेगी
अब
तुम्हारे बगैर...

Wednesday, October 27, 2010

दर्द का दवा हो जाना




उसने कहा दर्द बहुत है
जाने क्यों मै भी कराहती रही
न सोई न जागी
रात भर दर्द को पुकारती रही
उसने कहा ये दर्द
उसका अपना हो गया है
उसके साथ सोता है
जागता है रात भर
मुझसे अधिक वही तो
रहता है उसके खयालों मे
बस यही बात
मेरे मन को सालती रही
ये दर्द लगता है
अपनी हद पार कर गया
झलकता था जो आँखों से उसकी
आज सीने में उतर गया
मेरी तमाम कोशिशे
मुझे मुह चिढाती रही
बेदर्द तो है दर्द
बेवफ़ा भी हो जाता काश
छटपटाता,करवट बदलता
जाने कैसे-कैसे
मन को मै मनाती रही
किन्तु
बहुत मुश्किल है दर्द का
बेवफ़ा हो जाना
हद से गुजरना दवा हो जाना।

सुनीता शानू

Thursday, September 30, 2010

अब कैसा फ़ैसला

सोचती हूँ

फ़ैसला हो जाये अब तो
कैसा फ़ैसला?
जो सबका रखवाला है

नही करेगा अपनी रखवाली
सौप देगा कैसे
जन्मभूमि अपनी
रक्षक तो वही एक है
तो वही करेगा
वही करेगा
फ़िर भी आने दो फ़ैसला
कैसा फ़ैसला?


साच को आँच कैसी
हर घड़ी अग्नि-परीक्षा कैसी
टूटेगा कब तक
विश्वास राम का
लेने दो फ़िर भी
जिसके हक में हो  फ़ैसला
फ़िर वही... फ़ैसला!
कैसा फ़ैसला?


तुमसे नही माँगा जब कुछ
मेरा मुझे सौंपने में
अब विलम्ब क्यूं
राम जाने
रामदीन का
कब होगा निपटारा
अलादीन से
दोनो बंदे
एक दीन के
फ़िर जाने अब
क्या होगा फ़ैसला
फ़िर वही रट
बचकानी बात

कैसा फ़ैसला???

Thursday, September 23, 2010

एक हास्य-व्यंग्य कविता

गूगल से साभार



कौन घड़ी में भैया हम घर में टीवी लाये,
केबल वाले ने भी आकर झटपट तार लगाये,
झटपट तार लगाये , टी वी हो गया चालू,
दोसो रुपये में बिकने लगा दस रूपये का आलू,
दोसौ रूपये का आलू! हमने कान लगाये,
अंकल चिप्स दो लाकर बच्चे चिल्लाये,
कौन घड़ी में भैया हम घर में टी वी लाये।




देखते ही देखते सज गई सितारों की दूकान,
तेल बेचे बिग बी गंजे हुए किंग खान,
गंजे हुए किंग खान बोले डिश टी वी लगवायें,
टा-टा स्काई को अच्छा आमिर बतलायें,
ऎसा हुआ धमाल कि हमको चक्कर आये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






बीवी बोली आज हमे नवरतन तेल लगाना है,
बिग बी जैसे ठंडा-ठंडा कूल-कूल हो जाना है,
ठंडा-ठंडा कूल कूल जो सर्दी का अहसास कराये,
दफ़्तर से श्रीमान जी आप तेल बिना न आयें,
तेल बिना क्या पूछ हमारी कोई हमको बतलाये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






तेल लगा बालो में जब श्रीमती मुस्कुराई,
ऎश्वर्या ने कोका कोला की सी सीटी बजाई,
हम दौड़े घर के भीतर न हो जाये कोई फ़रमाइश,
बेटा बोला कोला रहने दो पापा लादो स्लाइस,
मां ने भी चाहा की बालो पर हेयर डाई लगवाये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






चुन्नू बोला डेरी मिल्क हमको लगती प्यारी,
सनफ़िस्ट की रट लगाने लगी दुलारी,
टॉमी को भी अब हम पेडीग्री खिलायेंगे
वरना देखो प्यारे पापा हम भूखे ही सो जायेंगे,
बाल हठ के आगे हमको चक्कर आये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






घर हमारा बन गया फ़रमाइशी दुकान,
विज्ञापनों की दौड़ में ऎसा हुआ नुकसान,
ऎसा हुआ नुकसान प्याज कटे बिन आँसू आये,
बदल दे घर का नक्शा  आप एल सी डी लगवाये,
सुनकर ये फ़रमान हम न रोये न हँस पाये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






सुनीता शानू

Saturday, September 11, 2010

एक विचार (कविता)





कभी-कभी आत्मा के गर्भ में,
रह जाते हैं कुछ अंश-
दुखदायी अतीत के,
जो उम्र के साथ-साथ,
फलते-फूलते-
लिपटे रहते हैं-
अमर बेल की मानिंद...


अमर बेल-
जो 
पीडित आत्मा को सूखा कर-
बनादेती है ठूँठ
ठूँठ 
जिसपर-
नही होता असर-
खुशियों की बरसात का
जिस पर नही पनपती
उम्मीद कोई...


ये दुखदायी अतीत के अंश
होते है जंमांध 
और कुँठित मन
सुन नही पाता
बदलते वक्त की आहट
कह भी नही पाता
मन की कड़वाहट


क्योंकि
इनकी काली परछाई
नही छोड़ती कभी
आत्मा को अकेले
सालती रहती हैं-
टीस बन कर
उम्र भर--


सुनीता शानू





Sunday, September 5, 2010

एक व्यंग्य कविता

गूगल से साभार




करामाती इंजेक्शन


होटल के एक कमरे में प्यारे लाल ठहरे
अभी आये भी नही थे उन्हे
खर्राटे गहरे
कि इतने में आवाज सुनी

किसी के रोने की
किसी के सिससने की
किसी के दर्द से कलपने की
साँप के फ़ुफ़कारने की  फ़िर-
हल्की सी घुटी-घुटी एक चीख आई
डर के प्यारे लाल ने बत्ती जलाई
और जोर से चिल्लाये
कौन है भाई?

ये होटल है या भूत प्रेत का  डेरा
आवाज सुन कर दौड़ता आया बेयरा
साहब क्या लाऊँ फ़रमाया
इतनी रात क्यों हमे जगाया

गुस्से में प्यारे लाल लाल हुए
बोले-
कैसा ये होटल है बतलाओ
क्या हो रहा इतनी रात समझाओ
वरना मै अभी पुलिस बुलाऊँगा
तुम सबको हवा जेल की खिलवाऊँगा

वेटर जो चुप खड़ा था
जोर से हँस दिया
प्यारे लाल ने गुस्से मे आ झापड़ जड़ दिया
कमबखत हमारा मजाक उड़ाता है
देर रात मुसाफ़िरों को डराता है

वेटर बोला लगता है आप
नही जानते कुछ माई बाप
नही यहाँ होता है कोई पाप
नही बगिया में है कोई साँप
ये तो इंजेक्शन का कमाल है
तभी तो कच्चा टमाटर भी हो जाता लाल है
सेब आम पपीते लौकी तुरई खीरे
जो खायेंगे आप सवेरे

ये करामाती इंजेक्शन
एक रात में करामात दिखलाता है
नवजात शिशु को ताकतवर बनाता है
प्यारे लाल झल्लाये
दिल किया एक इंजेक्शन इसे भी लागायें

फ़ल सब्जियां क्या इसान भी अब कृत्रिम हो गया है
दवाओ से फ़लता-फ़ूलता है दवाएं ही खाता है
विज्ञान का चमत्कार
परखनली का इंसान
भगवान की बनाई सृष्टि का
बन बैठा भगवान।

सुनीता शानू

Friday, August 6, 2010

मै मायके चली जाऊँगी

बहुत दिनो से ब्लॉग हमारा सूना-सूना पड़ा है। समझ नही पाये क्या लिखें। क्यों न कुछ हास्य ही हो जाये...आज जनमदिन है हमारा भई....जिसे केक खाना है उसे कविता भी सुननी ही पड़ेगी भैया... :)


गुगल से साभार स्पेशल केक मँगाया है आपके लिये बस खाते जाईये....


पत्नी बोली पतिदेव जी तुम पर भारी पड़ जाँऊगी,
अगर न मानी बात मेरी तो मायके चली जाऊँगी।




दफ़्तर की खींचा तानी से जब थककर घर को आओगे,
एक चाय की प्याली भी तुम अपने हाथ बनाओगे।
कौन पिलायेगा फ़िर तुमको चाय वो अदरक वाली,
एक हाथ से प्यारे मोहन नही बजती है ताली।
चुन्नू,मुन्नू बंटी को भी सौप तुम्हे ही जाँऊगी,
अगर न मानी बात मेरी तो मायके चली जाँऊगी।




टूटे पड़े बटन शर्ट के ये पतलून भी फ़टी हुई,
कौन धोयेगा गंदे कपड़े धोबन भी छुट्टी गई,
ढूँढ न पाओगे रखा कहाँ है कुर्ता और पाजामा,
आज पड़ेगा प्यारे तुमको ऎसे ही दफ़्तर जाना,
कपड़ो की अलमारी पर भी मै ताला कर जाऊँगी,
अगर न मानी बात मेरी तो मायके चली जाऊंगी।




आलू गोभी,लौकी,बैंगन सब तुमको नाक चिड़ायेंगे,
बिना पकाये ये सारे तो ऎसे ही सड़ जायेंगे,
नही पकेगी दाल मूँग की कड़वा करेला खाओगे,
बच्चों के संग होटल जा अपनी जान बचाओगे,
बचे हुए जो घी के लड्डू वो भी साथ ले जाऊँगी,
अगर न मानी बात मेरी तो मायके चली जाँऊगी।




टेबल पर बरतन पड़े हैं रखा है झूठा अचार,
लीची लुड़की फ़र्श पर और सोफ़े पर अखबार,
मित्रों को बुलाकर जो घर में दंगल मचाओगे,
बर्तन भी खुद रगड़ोगे चोट दिल पर खाओगे,
सच कहती हूँ अबके गई तो नानी याद दिलाऊँगी,
अगर न मानी बात मेरी तो मै मायके चली जाऊँगी।




सुनीता शानू

Monday, November 2, 2009

आ गई कुछ यादें चुपके से...

यूँ हीं आई जब याद बात कोई तो कागज़ पर कलम फ़िर चल पड़ी....





















आधी बात कही थी तुमने


और आधी मैने भी जोड़ी

तब जाकर बनी तस्वीर

सच्ची-झूठी थोड़ी-थोड़ी

नटखट सी बातों के पीछे

दुनिया भर का प्यार छुपा

मुस्काती आँखो ने भी

जाने कितने स्वप्न दिखा

लूटा था भोला-सा बचपन

और मिला जब

पहला-पहला खत तुम्हारा

तुड़ा-मुड़ा, कुछ भीगा-भागा

भोर के स्वप्न सा

आधा सोया, आधा जागा

कैसे तुमने ओ लुटेरे

दिल को चुराया चुपके से

न दस्तक न आहट ही

दिल में मचाया शोर

चुपके से...



सुनीता शानू

Wednesday, October 14, 2009

आप सभी को दीपावली की शुभकामनाएं

 आप सभी के आशीर्वाद से मेरे पति बिलकुल स्वस्थ हैं।जिंदगी के ऎसे दुखद समय में जब सब साथ छोड़ देते हैं आप सब की दुआयें मेरे साथ ढाल बन कर डटी रही ।आज वे बिलकुल स्वस्थ है और घर लौट आये हैं। आप सभी की दुआओ और माँ दुर्गा के आशीर्वाद का फ़ल ही है कि हम आप सभी के साथ दीपावली धूम-धाम से मना पायेंगे।



आप सभी को सपरिवार दीपावली की शुभकामनाएं।

सुनीता शानू

Tuesday, August 18, 2009

मासूमियत के हनन की तस्वीर





उम्मीदों और खुशियों से भरी
एक मीठी सी धुन गाता हुआ वह
चलाये जा रहा था
हाथो को सटासट...


कभी टेबिल तो कभी कुर्सी चमकाते

छलकती कुछ मासूम बूँदें
सुखे होंठों को दिलासा देती उसकी जीभ
खेंच रही थी चेहरे पर
उत्पीड़न से मासूमियत के हनन की तस्वीर


मगर फ़िर भी
यन्त्रचालित सा
हर दिशा में दौड़ता
भूल जाता था कि
कल रात से उसने भी
नही खाया था कुछ भी...

एक के ऊपर एक करीने से जमा
जूठे बर्तन उठाते उसके हाथ
नही देते थे गवाही उसकी उम्र की
मासूम अबोध आँखों को घेरे
स्याह गड्ढों ने भी शायद
वक्त से पहले ही
समझा दिया था उसे
कि सबको खिलाने वाले उसके ये हाथ
जरूरी नही की भरपेट खिला पायेंगे
उसी को....



सुनीता शानू

अंतिम सत्य