चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Saturday, June 2, 2007

कन्यादान





















इतिहास ने फ़िर धकेलकर,

कटघरे में ला खड़ा किया...

अनुत्तरित प्रश्नो को लेकर,

आक्षेप समाज पर किया॥

कन्यादान एक महादान है,

बस कथन यही एक सुना...

धन पराया कह-कह कर,

नारी अस्तित्व का दमन सुना॥

गाय, भैस, बकरी है कोई,

या वस्तु जो दान किया...

अपमानित हर बार हुई,

हर जन्म में कन्यादान किया॥

क्या आशय है इस दान का,

प्रत्यक्ष कोई तो कर जाये,

जगनिर्मात्री ही क्यूँकर,

वस्तु दान की कहलाये॥

जीवन-भर की जमा-पूँजी को,

क्यों पराया आज किया...

लाड़-प्यार से पाला जिसको,

दान-पात्र में डाल दिया॥

बरसों बीत गये इस उलझन में,

न कोई सुलझा पाये..

नारी है सहनिर्मात्री समाज की,

क्यूँ ये समझ ना आये॥

हर पीडा़ सह-कर जिसने ,

नव-जीवन निर्माण किया,

आज उसी को दान कर रहे,

जिसने जीवन दान दिया॥

सुनीता(शानू)


44 comments:

  1. 'पुलिटिकली करैक्ट' कविता . लिखती रहें .

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  2. बहुत सुन्दर रचना... और समाज के चेहरे से नकाव उठा दिया आप ने... बदलाव आ रहा है, मगर समय लगेगा.

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  3. कन्यादान शब्द से तो मुझे भी आपत्ति रही है। आख़िर नारी कोई वस्तु थोड़े ही है जिसे दान किया जाये। सुंदर भाव हैं।

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  4. जो अनुत्तरित रहा अभी तक, तुमने फिर वह प्रश्न किया है
    मैं जिस उत्तर की तलाश में निशि दिन प्रश्न बना फिरता हूँ

    खूबसूरत खयाल हैं आपके

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  5. पुरानी रिवाज को तोड़ती आप की रचना बहुत सुन्दर और सही प्रश्न उठा रही है। बहुत सुन्दर भाव है।..

    हर पीडा़ सह-कर जिसने ,नव-जीवन निर्माण किया,आज उसी को दान कर रहे,जिसने जीवन दान दिया

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  6. आपकी कविता पढ़कर मुझे सुभद्रा कुमारी चौहान जी की याद आ गयी। मैंने कहीं पढ़ा था कि उन्होंने अपनी बेटी का कन्यादान करने से इसी कारण इनकार कर दिया था। हालाँकि बाद में वो अपनी बात पर कायम रह पायीं या नहीं, मैं नहीं जानता। सचमुच आप ने एकदम सही प्रश्न उठाया है। सुंदर विचार और कविता, दोनों के लिये बधाई।

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  7. जीवन-भर की जमा-पूँजी को,

    क्यों पराया आज किया...

    लाड़-प्यार से पाला जिसको,

    दान-पात्र में डाल दिया॥

    वाह ... सुनीता जी हमेशा की तरह इस बार भी ... सुन्दर मगर सोचने को मजबूर करती कविता आपकी

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  8. सुनीता जी, आप ने हमारे समाज के एक सनातन विद्रुप का आवेगात्मक चित्रण किया है.इस कन्यादान के धर्म-जाल से बाहर निकलने के लिए एक आमूल क्रान्ति की आवश्यकता है जिसकी अगुवाई नारी को ही करनी होगी.अपना जीवन-साथी खुद तलशने की तथा विवाह की नितान्त अनिवार्यता को कटघरे मे खड़ा करने की ज़रूरत है.

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  9. संजय बेंगाणीJune 1, 2007 at 7:49 PM

    कविता व विषय दोनो ही खुब है. सुन्दर कविता.

    हमारे यहाँ तो दान-पूण्य जैसा कुछ होता नहीं अतः हमे तो आप बरी कर ही सकती है. :)

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  10. आपके प्रश्नों के प्रति मैं निरुत्तर हूं

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  11. बहुत सुन्दरता से कितनी गहरी बात की है. सत्य है, कन्या कोई दान की वस्तु नहीं है.

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  12. अच्छा प्रयास है, कदाचित संभावनायें भी हैं.

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  13. बहुत सुंदर भाव लिये आपकी कविता अच्छी लगी.

    पढ़ते समय लगा जैसे ह्रदय की वेदना प्रस्फ़ुटित हो रही है ...

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  14. एक सच की उजगार किया है आपने अपनी कलम से .सुनीता ..पर अभी बहुत वक़्त लगेगा
    इन सवालो के जवाब में ...एक आशा है की वक़्त बदलेगा ज़रूर !!

    एक बार मैने भी इसी विषय पर लिखा था उसकी कुछ पंक्तियाँ याद आ रही हैं .....

    है मेरे दम से बाबुल तेरे घर में उजियारा..
    सितारो सी मैं घर के आँगन में जगमगाती हूँ,

    मुझे भी रखो बाबुल संग अपने जैसे भैया
    क्यूं मैं तेरी हो के भी धन पराया कहलाती हूँ !!

    पूरी कविता फिर कभी :)
    रंजना

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  15. ji bahut accha mudda uthaya hai aapne kanyadhan yah hamare samaj ki ek bahut buri soch hai purus prdhan samaj na apne aadhikar janta hai ur na kisi estri ko aage barta dekh rakta hai ab samay aa gaya hai ki larkiya yah sabit karen ki bo kisi se kam nahin hai,

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  16. दी',

    समझ नही पा रहा कि इन पँक्तियों पर क्या टिप्पणी करूँ ?

    जहाँ हमारी मौलिक काव्य यात्रा खत्म होती है, आप वहाँ से लिखना शुरु करती है॰॰॰
    बेहद उम्दा काव्य॰॰॰॰ कुछ ऍसा, जो समाज परिवर्तन का माद्दा रखता है।
    वास्तव में मैं तो कभी इस दिशा मे सोच ही नही पाया कि "कन्या"- दान की विषयवस्तु बनायी जा रही है, और वो भी सदियों से॰॰॰॰
    मै आपके सफल काव्य जीवन की कामना करता हूँ ।
    आर्य मनु।

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  17. ji bahut accha mudda uthaya hai aapne kanyadhan yah hamare samaj ki ek bahut buri soch hai purus prdhan samaj na to apne aadhikar janta hai ur na kisi estri ko aage barta dekh sakta hai ab samay aa gaya hai ki larkiya yah sabit karen ki bo kisi se kam nahin hai,

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  18. मेरे देर से लिखने के लिये माफी . . .
    हमारी सनातन परम्परा मे दान का बडा महत्व है, हम सदैव अच्छी व प्रिय वस्तु का ही दान करते आये है यानी जिसको देने से दिल दुखे, राजा बली जिसे हमारी परम्परा के आदि दानी पुरुष माना जाता है ने अपना सम्पूर्ण राज्य दान मे दे दिया था. “येन बद्धो बली राजा दानेन्दो महाबला . . .” यही हमारे हाथो मे बधने वाले रक्षा सूत्र के मन्त्र के रूप मे पढा जाता है. कालान्तर मे दान की परिभाषा की सोच मे बदलाव आ गया. अब भी प्रिय वस्तु के दान से दिल तो रोता है, शानु जी आपने दान का जो चित्रण किया है वह दान के बदलते स्वरूप का चित्रण है आज यही चिन्तन आम है कन्यादान हमारी सनातन परम्परा मे बहुत बडा दान है आपने इसके मार्मिक पहलू का जो चित्र इस कविता मे खीचा है वह सचमुच काबिल ए तारीफ है . लिखते रहें . . . .

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  19. Hello Mam,

    Such a nice poetry send by you....
    thanks for the wonderful poem....

    i am really appriciated n respect your feelings....now those days dowery is a fashion but in my opinion it's a crime.....because

    "DULHAN HI DAHEJ HAI"
    &
    "KANYA DAAN MAHA DAAN"

    I HOPE YOUR POEM HELPS TO CHANGE FEELINGS OF THOSE WHO DO THESE THINGS.....

    thanks
    Aditya

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  20. भावपूर्ण कविता के लिए बधाई।
    आपके प्रश्नों ने मन में जगह बना ली है। सत्य कथन है आपकी कविता में, इस कविता के प्रश्नों के उत्तर का भी इंतज़ार रहेगा।

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  21. This is superb. "आज उसी को दान कर रहे, जिसने जीवन दान दिया॥". You write quite well. But the questions that you have asked are not so easy to answer, as no one person can change the society in large, in a short time. But let us contribute out bit.

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  22. समाज में जिस धीमीगति से बदलाव हो रहा है उससे आपके प्रश्न बहुत दिनों तक अनुत्तरित रहेंगे। बहुत खुशी हो रही है कि अंतरजालीय कवयित्रियाँ भी कविताओं के क्षितिज को विस्तारित कर रही हैं। यद्यपि आवाज़ें तो उठी हैं लेकिन फुसफुसाहट जैसी, मगर आपकी आवाज़ में दम है। इस तरह की घटिया कुप्रथाओं पर प्रहार करना आवश्यक है।

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  23. Iss kavita ke maadhyam se aapne jo prashn uthaya hai,abhi tak vo anuttarit hi hai. Purani prathao per prashn chihn lagaati aapki rachna ati sunder hai. Samaaj mei faili kureetiyo ko dur karne ke liye aaj kalam ke sipahiyo ki aavashyakta hai. Aap badhaai ki paatr hain...

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  24. बहुत ही अच्छी कविता है।

    अक्षय

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  25. सुनीता जी..
    कविता का दर्द महसूस किया जा सकता है।
    "गाय, भैस, बकरी है कोई,या वस्तु जो दान किया..."
    कितना गंभीर प्रश्न किया है आपने।
    "आज उसी को दान कर रहे,जिसने जीवन दान दिया"

    अंतरात्मा को झिंझोडती है यह रचना, बहुत बधाई आपको।

    *** राजीव रंजन प्रसाद

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  26. bahut sunder hai ye kavita

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  27. सुनीता जी! बहुत भावपूर्ण रचना है,बधाई
    एक डर है,सोचा कह तो दूं.
    समाज दुर्दांत होता जा रहा है,
    दान है तो भी अच्छा है,
    यह भी नही रहा तो डर है कि
    भेड़ बकरी ना समझले कोई,

    और सुनीता जी!
    बे-रूपिया समाज बेचेगा,
    भेड़-बकरियां दान कौन करता है? अफ़सोस,बिकतीं हैं.
    मेरा डर है बस,----
    रचना तो सम्पूर्ण है

    प्रवीण पंडित

    .

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  28. Kanyadaan
    this can be stopped only when the girls will revolt against this adn say that they will not marry with this rite. and all man who accept knaydaan are beggers because daan is only given to beggars . so man should also revolt and not accept any daan whether kanya or otherwise .

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  29. आपने जो कहा ये एक ऐसा सच हैं जो सच के मुह पर धब्बा हैं ...

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  30. सभी ने विस्तार से कह ही दिया है, अब मैं क्या कहूँ, पद्य गहरे घाव करता है..मैं तो कविता लिख ही नहीं पाता, लेकिन आप बखूबी लगी रहिये, शायद इसी बहाने हममें थोडी़ कविता की समझ आ जाये, बहुत खूब...

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  31. सुनीत जी,

    एक सुन्दर विषय पर
    इतनी सुन्दर तरह से
    लिखने के लियें मेरी
    बधई स्वीकार करें...

    और इतना कहुंगी...

    अनुत्तरित प्रश्न..
    करते विह्वल...
    होता आर्द्र...अंतःस्थल..

    सस्नेह्
    गीता पण्डित

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  32. सुनीता जी,
    मैं संजीव तिवारी जी के शब्दों से पूरी सहमति रखता हूँ, कि शास्त्रानुसार जितनी प्रिय वस्तु होती है, उसका दान उतना ही महत्वपूर्ण होता है, पर फिर बात वही कि नारी कब तक 'चीज' भर बनी रहेगी।हालांकि अब नारी की जंजीरें पिघल पिघल कर टूटने लगी हैं, पर सारी वर्जनाऔं की दावेदारी और जिम्मेदारी नारी मात्र को उठानी हो ये तो न्याय संगत नहीं है।

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  33. इन पंक्तियों में बहुत बड़ी सच्चाई है -दीपक भारतदीप

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  34. सच कहती हैं आप , नारी कोई वस्तु नही है जो दान की जाये , पता नही कब ये शब्द भारत की संकृति के सम्मिलित हो गया क्योकी जहाँ तक मैं जानता हूं पूर्व मे भारत मे नारी सत्ता (मातृ सत्तात्मक) का चलन था तब शायद पुत्रदान होता होगा :) , गंभीर प्रश्न है किन्तु आज प्रश्न उठाने मे आप जैसी नारी समर्थ है और ईस शव्द को अब बदला जा सकता है

    वैसे तो सम्पुर्ण कविता ही सुंदर एवं भावपूर्ण है किन्तु निम्न पक्तियाँ वाह वाह

    भैस, बकरी है कोई,या वस्तु जो दान किया...

    हर पीडा़ सह-कर जिसने ,नव-जीवन निर्माण किया,आज उसी को दान कर रहे,जिसने जीवन दान दिया॥

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  35. aapki kavita me dil ko choo jane wale ashar hai ek ek shabd dil par hathode ki tarah chot karta hai aisa lag rha hai jaise poore samaj ko katghare me khada kar ke sampooran nari warg apna jawab mang rahi hai aur sahi mayane me aapne bhavnatmak nari hone ka poora ahsas is kavita me vyakt kiya hai

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  36. Wonderful!!!

    This truth has been given such a delcate veil through a word and you have taken the viel off so that the truth can be encountered as it is...direct...face to face. It is a forceful work in that it coaxes one to think and feel ashamed of what we have been doing down the centuries. My congratulations on your thoughts and words.

    I also noted that you visited and read my mother's work. Thank you for your comments on her story "puraskaar"

    Regards

    Shekhar

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  37. कुछ परंपराएँ बस निभाने के लिए चलती चली जाती हैं, कुछ बस हैं तो हैं.. चाहे वक्त बदल गया हो । पर समाज की मानसिकता तो दर्शाती ही है । परंपरा और विवादास्पद विषय पर अच्छे प्रश्न उठाए हैं कविता के माध्यम से ।

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  38. Bahut khoob likha hai Shaanoo ji..

    Lekin mere vichaar mein.. Jab "kanyadaan" shabd ka upayog hota hai , kanya apamanit nahi hoti.. naahi woh purush jo yeh daan prapt karta hai..

    Jaise jab aahaar ka daan hota hai, ahaar bhi samaanit hota hai aur woh bhikshu bhi dhanya ho jaata hai..

    Aur daan bhi sammanit vastuon ka hee hota hai.. jaise raktdaan, netradaan ityadi..
    Yeh isliye keh raaha hoon main.. ke main prateeksha mein hoon ke koi kanyaadaan kare aur main bhi dhanya ho jaaoon..

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  39. उत्तम जी मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ है जल्दी ही आपके जीवन में एक सुन्दर-सुशील कन्या का आगमन हो । मगर ये कह कह अपनी भावी पत्नी को लज्जित ना करें की उसका दान हुआ और आप दान लेने वाले है...मेरी कविता जरा गौर से पढी़येगा..प्रश्न ये नही की विवाह ना हो और ये भी नही की आप दान ना करे...बस यही कहा है मैने कन्या को दान ना कहा जाये..स्त्री का समाज के निर्माण में उतना ही सहयोग है जितना पुरूष का...यदि दुसरे शब्दो में आप सुनना चाहते है तो स्त्री का समाज निर्माण में जितना "योगदान" है उतना ही पुरूष का भी है तो ये पुत्रदान क्यूँ नही कहलाता? क्यूँ कन्या को ही अपना घर छोड़कर जाना होता हैहर जगह समान अधिकार मिलना चाहिये...और बहुत से सवाल है कभी वक्त मिला तो जरूर पुछूँगी...

    सुनीता(शानू)

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  40. Yah kavitaa bhi baaki kavitaaoon ki tarah hi acchii lagii ..

    Ripudaman

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  41. शानू,
    आप मेरे विचार की मोहताज तो नहीं हैं और बहुत जबरदस्त उद्गार है आपकी लेखनी में जो अब कम ही दिखता है प्रासंगिक विषयों पर पर मेरा दृष्टिकोण इअस विषय पर थोड़ा अलग है क्योंकि जो दान दिया जाता है वह सर्वोतम माना गया है अपने शास्त्रों में और इसे दिया उसी रुप में जाता है जैसे बुद्धा ने इसे भिक्षा के रुप में स्वीकार किया था हाँ भिक्षा का अर्थ वहाँ दूसरा है जो आज की तरह का नही है…मन की संतुष्टि और दूसरों के स्नेह को बरकरार रखने के लिए दान का निष्पादन किया है…।

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  42. आज उसी को दान कर रहे,
    जिसने जीवन दान दिया।

    बहुत खुब । बधाई स्वीकारें।

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  43. आपकी रचना तो बहुत अच्छी लगी, लेकिन कुछ सवाल अनुत्तरित रहे गए हैं. यह आडम्बर है या पूर्वजों द्वारा बनाये गए आग्रह, जिससे हमारा समाज बिखर ना पाए. जरा उस नारी की कल्पना कीजिये, जो आज किसी बंधन में नहीं जीना चाहती, कोई सामाजिक बंधन उसे स्वीकार्य नहीं| कृपया यह बताने का कष्ट करें, यदि समाज नहीं होगा तो आप किस रूप में जीवन की कल्पना करती हैं|

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  44. कन्यादान का अर्थ है- अभिभावकों के उत्तरदायित्वों का वर के ऊपर, ससुराल वालों के ऊपर स्थानान्तरण होना । अब तक माता-पिता कन्या के भरण-पोषण, विकास, सुरक्षा, सुख-शान्ति, आनन्द-उल्लास आदि का प्रबंध करते थे, अब वह प्रबन्ध वर और उसके कुटुम्बियों को करना होगा । कन्या नये घर में जाकर विरानेपन का अनुभव न करने पाये, उसे स्नेह, सहयोग, सद्भाव की कमी अनुभव न हो, इसका पूरा ध्यान रखना होगा । कन्यादान स्वीकार करते समय-पाणिग्रहण की जिम्मेदारी स्वीकार करते समय, वर तथा उसके अभिभावकों को यह बात भली प्रकार अनुभव कर लेनी चाहिए कि उन्हें उस उत्तरदायित्व को पूरी जिम्मेदारी के साथ निबाहना है । कन्यादान का अर्थ यह नहीं कि जिस प्रकार कोई सम्पत्ति, किसी को बेची या दान कर दी जाती है, उसी प्रकार लड़की को भी एक सम्पत्ति समझकर किसी न किसी को चाहे जो उपयोग करने के लिए दे दिया है । हर मनुष्य की एक स्वतन्त्र सत्ता एवं स्थिति है । कोई मनुष्य किसी मनुष्य को बेच या दान नहीं कर सकता । फिर चाहे वह पिता ही क्यों न हो । व्यक्ति के स्वतन्त्र अस्तित्व एवं अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता, न उसे चुनौती दी जा सकती है । लड़की हो या लड़का अभिभावकों को यह अधिकार नहीं कि वे उन्हें बेचें या दान करें । ऐसा करना तो बच्चे के स्वतन्त्र व्यक्तित्व के तथ्य को ही झुठलाना हो जाएगा ।
    कन्यादान का यह तात्पर्य कदापि नहीं, उसका प्रयोजन इतना ही है कि कन्या के अभिभावक बालिका के जीवन को सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुख-शान्तिमय बनाने की जिम्मेदारी को वर तथा उसके अभिभावकों पर छोड़ते हैं, जिसे उन्हें मनोयोगपूवर्क निबाहना चाहिए । पराये घर में पहुँचने पर कच्ची उम्र की अनुभवहीन भावुक बालिका को अखरने वाली मनोदशा में होकर गुजरना पड़ता है । इसलिए इस आरम्भिक सन्धिवेला में तो विशेष रूप से वर पक्ष वालों को यह प्रयास करना चाहिए कि हर दृष्टि से वधू को अधिक स्नेह, सहयोग मिलता रहे । कन्या पक्ष वालों को भी यह नहीं सोच लेना चाहिए कि लड़की के पीले हाथ कर दिये, कन्यादान हो गया, अब तो उन्हें कुछ भी करना या सोचना नहीं है । उन्हें भी लड़की के भविष्य को उज्ज्वल बनाने में योगदान देते रहना है । क्रिया और भावना- कन्या के हाथ हल्दी से पीले करके माता-पिता अपने हाथ में कन्या के हाथ, गुप्तदान का धन और पुष्प रखकर सङ्कल्प बोलते हैं और उन हाथों को वर के हाथों में सौंप देते हैं । वह इन हाथों को गंभीरता और जिम्मेदारी के साथ अपने हाथों को पकड़कर स्वीकार-शिरोधार्य करता है । भावना करें कि कन्या वर को सौंपते हुए उसके अभिभावक अपने समग्र अधिकार को सौंपते हैं । कन्या के कुल गोत्र अब पितृ परम्परा से नहीं, पति परम्परा के अनुसार होंगे ।

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स्वागत है आपका...