चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Thursday, July 7, 2011

बूढा है की मरता ही नही।




पँचवटी पिलानी राजस्थान
वास्तविकता पर आधारित एक प्रकाशित रचना...




आज सब कुछ
बदला-बदला सा है,
उन रोती बिलखती आँखों में
नही है अंगारे
उन होठों पर
गाली भी नही है
हाँ दर्द झलक रहा है
दुनिया भर का दर्द
कि कैसे जीयेंगे हम
इन बच्चों का क्या होगा
हाय बाबूजी
हमे अनाथ कर गये
चीखे हवा में
कलाबाजियाँ खाने लगी
कि हवा भी
आदमी के दोगलेपन से
बरगलाने लगी
बूढ़ा मरता क्यूँ नही
खाँसता रहता है रात भर
न दिन में चैन
न रात मे आराम
बच्चे भी परेशान
हे भगवान ये
कब जायेगा शमशान
जाने क्यों समझता ही नही
बूढ़ा मरता ही नही....।

26 comments:

  1. बहुत प्रभावित करती रचना ..... यही दोगलापन है अब रिश्तों में ...समाज में ...परिवारों में....

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  2. कब उतरेंगे यह नकाब हमारे चेहरे से सच्चाई को दर्शाती हुई रचना , आभार

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  3. जाने क्यों समझता ही नही
    बूढ़ा मरता ही नही....।

    aapne to ek dum se dard ke saath vastvikta ko samne rakh diya!!

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  4. शानू की एक ओर कड़वी सच्ची रचना।! यह पृथ्वी भी बेबस बुज़र्गो के लिये बिलखती रोती होगी। ज़माने के मतलब फरोश बच्चों को कब होश आयेगा।

    रमेश

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  5. कटु सत्य को कहती एक यथार्थ रचना ...

    पिलानी का पंचवटी बहुत बार देखा है ... सुन्दर चित्र

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  6. मार्मिक लेकिन कटु यथार्थ से रूबरू करवाती इस रचना के लिए बधाई स्वीकारें

    नीरज

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  7. कटु यतार्थ को उजागर करती हुई मार्मिक रचना...

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  8. सच में जिन्दगी के सच को उजागर करती कविता

    ना जाने क्यों लोग ...दोहरा जीवन जीते है ...
    खुद के रिश्तो को ढ़ोते क्यों है ....जीते क्यों नहीं उन रिश्तो को
    दुःख होता है जब अपने ही अपनों को नहीं समझते

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  9. aap sabhi ko bahut bahut dhanyavaad. hindi fonts kaam nahi kar raha padhne mai asuvidha hogi kshama karen...

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  10. ek yatharth, ek khara sach, behatar post, badhai

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  11. जीवन की कटु सच्चाईयों से रूबरू कराती, मर्म स्पर्शी सुंदर रचना. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

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  12. कल 14/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  13. bahut sundar rachnaa


    khud kaa jeenaa
    kisi aur ke jeene se
    jyaadaa zarooree ho gayaa
    rishton ko curfew lag gayaa
    swaarth mein insaan
    insaaniyat bhool gayaa

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  14. जीवन का यथार्थ यही है.

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  15. बहुत सुंदर रचना
    क्या कहने।
    हकीकत के बिल्कुल करीब या कहें हकीकत ही ये है।

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  16. सच्चाई को सामने रखती हुई रचना. इंसान मुखौटा लगाये घूमता है !
    बेहतरीन पस्तुति !!

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  17. क्या कहें सुनीता जी ! कड़वा सच बयान किया है आपने.

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  18. इंसान के दोगलेपन पर करारा प्रहार करती बहुत ही सशक्त रचना ! मरणोपरांत जिस प्यार और सम्मान का प्रदर्शन किया जाता है उसका सौंवा अंश भी बुजुर्गों के जीवन काल में यदि उन्हें मिल जाये तो यह धरती स्वर्ग सी सुन्दर हो जाये !

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  19. कटु सत्य को उद्धृत करती प्रभावशाली रचना...
    सादर...

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स्वागत है आपका...