चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Thursday, April 12, 2012

भूल जाईये बीते कल को आगे बढ़ना ही नियति है...




कृपया क्षमा करें कुछ मित्रों को मुझे परेशान देख बहुत दुख हुआ। रोना धोना और चिल्लाना मेरी यह फ़ितरत भी नही अतः यह कविता यहाँ से हटा रही हूँ...

10 comments:

  1. chnd saase udhar wo bhi....bahut khoob

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  2. दीमक भी पूरा नहीं चाट खाती .... !
    ज़िन्दगी दरख़्त की ..... !!

    कडवी लेकिन सच .... !!

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  3. अनुपम भाव संयोजन लिए उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

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  4. कुछ अलग सी पोस्ट सच्चाई से कही गयी बात अच्छी लगी

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  5. यार्थार्थ को दर्शाती अभिवयक्ति..

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  6. tumhaaree saanso kee ghutan aur pareshaanaa samajh nahee aa rahee hai,
    sadaa hansne waalee aaj ro kyoon rahee hai
    aansoo paunchho aur uth jaao
    udhaar saanso par jeenaa chhod do

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  7. कभी-कभी ये चंद सांसे जीने का कितना बड़ा सहारा बन जाती हैं, उसे एक संवेदनशील मन ही समझ सकता है। कविया की संवेदना पाठकों तक पहुंचती है।
    मेरे जैसा पाठक जो गोरख पांडे की डायरी या परवीन शाकिर की चुप्पी को न जानता हो, उसे इस बिम्ब के प्रयोग से थोड़ी कठिनाई तो हो समती है लेकिन अर्थ स्पष्ट है ..।

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  8. शीर्षक तो बहुत अच्छा और प्रेरणादायी लग रहा है.
    फिर ऐसा क्या था आपकी पोस्ट में...??

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स्वागत है आपका...