
-दिल के कोरे कागज पर-
-खींचकर कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें-
-जब देखती हूँ...
-बन जाती है तस्वीर तुम्हारी-
-और लगता है कागज़ का वह टुकड़ा-
-कह रहा हो मुझसे-
-मै तो बसा हूँ दिल में तुम्हारे-
-क्यों कागज पर उतारा है?
-देखो बेरहम दुनियाँ जला न दे-
-देखो कहीं हवा उड़ा न दे-
-और घबरा कर मै समेट लेती हूँ-
-वो तस्वीर तुम्हारी....
-जब सुबह का सूरज-
-अपनी रौशनी फ़ैलाये-
-मेरी खिड़की से झाँकता है-
-मुझे नजर आते हो तुम-
-अपनी इन्द्र-धनुषी बाँहे फ़ैलाये-
-और मेरे चेहरे से छूती-
-तुम्हारी बाँहे-
-जगा देती है मुझे-
-तुम्हारे अहसास के साथ-
-सचमुच तुमसे मिलकर जिन्दगी-
-एक कविता बन गई है-
-और मै एक कलम-
-जो हर वक्त-
-तुम्हारे प्यार की स्याही से-
-बनाती है तस्वीर तुम्हारी...।
सुनीता(शानू)

