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चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...
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Thursday, 3 January, 2008

तस्वीर तुम्हारी


-दिल के कोरे कागज पर-

-खींचकर कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें-

-जब देखती हूँ...

-बन जाती है तस्वीर तुम्हारी-

-और लगता है कागज़ का वह टुकड़ा-

-कह रहा हो मुझसे-

-मै तो बसा हूँ दिल में तुम्हारे-

-क्यों कागज पर उतारा है?

-देखो बेरहम दुनियाँ जला न दे-

-देखो कहीं हवा उड़ा न दे-

-और घबरा कर मै समेट लेती हूँ-

-वो तस्वीर तुम्हारी....


-जब सुबह का सूरज-

-अपनी रौशनी फ़ैलाये-

-मेरी खिड़की से झाँकता है-

-मुझे नजर आते हो तुम-

-अपनी इन्द्र-धनुषी बाँहे फ़ैलाये-

-और मेरे चेहरे से छूती-
-तुम्हारी बाँहे-

-जगा देती है मुझे-

-तुम्हारे अहसास के साथ-

-सचमुच तुमसे मिलकर जिन्दगी-

-एक कविता बन गई है-

-और मै एक कलम-

-जो हर वक्त-

-तुम्हारे प्यार की स्याही से-

-बनाती है तस्वीर तुम्हारी...।
सुनीता(शानू)