चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Thursday, September 23, 2010

एक हास्य-व्यंग्य कविता

गूगल से साभार



कौन घड़ी में भैया हम घर में टीवी लाये,
केबल वाले ने भी आकर झटपट तार लगाये,
झटपट तार लगाये , टी वी हो गया चालू,
दोसो रुपये में बिकने लगा दस रूपये का आलू,
दोसौ रूपये का आलू! हमने कान लगाये,
अंकल चिप्स दो लाकर बच्चे चिल्लाये,
कौन घड़ी में भैया हम घर में टी वी लाये।




देखते ही देखते सज गई सितारों की दूकान,
तेल बेचे बिग बी गंजे हुए किंग खान,
गंजे हुए किंग खान बोले डिश टी वी लगवायें,
टा-टा स्काई को अच्छा आमिर बतलायें,
ऎसा हुआ धमाल कि हमको चक्कर आये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






बीवी बोली आज हमे नवरतन तेल लगाना है,
बिग बी जैसे ठंडा-ठंडा कूल-कूल हो जाना है,
ठंडा-ठंडा कूल कूल जो सर्दी का अहसास कराये,
दफ़्तर से श्रीमान जी आप तेल बिना न आयें,
तेल बिना क्या पूछ हमारी कोई हमको बतलाये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






तेल लगा बालो में जब श्रीमती मुस्कुराई,
ऎश्वर्या ने कोका कोला की सी सीटी बजाई,
हम दौड़े घर के भीतर न हो जाये कोई फ़रमाइश,
बेटा बोला कोला रहने दो पापा लादो स्लाइस,
मां ने भी चाहा की बालो पर हेयर डाई लगवाये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






चुन्नू बोला डेरी मिल्क हमको लगती प्यारी,
सनफ़िस्ट की रट लगाने लगी दुलारी,
टॉमी को भी अब हम पेडीग्री खिलायेंगे
वरना देखो प्यारे पापा हम भूखे ही सो जायेंगे,
बाल हठ के आगे हमको चक्कर आये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






घर हमारा बन गया फ़रमाइशी दुकान,
विज्ञापनों की दौड़ में ऎसा हुआ नुकसान,
ऎसा हुआ नुकसान प्याज कटे बिन आँसू आये,
बदल दे घर का नक्शा  आप एल सी डी लगवाये,
सुनकर ये फ़रमान हम न रोये न हँस पाये,
कौन घड़ी मे भैया हम घर में टी वी लाये।






सुनीता शानू

22 comments:

  1. भई वाह मजे आ गए पढ़कर...खूब मजा आया...
    यहां भी आएं
    http://veenakesur.blogspot.com/

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  2. मजेदार...आनन्द आया.

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  3. मध्यमवर्गीय परिवारों की व्यथा को व्यक्त करती बहुत ही सुन्दर एवं प्रभावी हास्य रचना :-)

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  4. wah wah
    excellent..
    badayi..ho..khoobsurt pyari..si..rachana...
    kulwant

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  5. बहुत ही मजेदार जी,

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    मशीन अनुवाद का विस्तार!, “राजभाषा हिन्दी” पर रेखा श्रीवास्तव की प्रस्तुति, पधारें

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  7. ha ha ha ha ha वाह क्या व्यंग है। बधाई।

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  8. अरे वाह! क्या बात है इस व्यंग रचना की .. हमारी उपभोक्ता-वादी मानसिकता पर जम कर चोट करती हुई ..वधाई !
    लेकिन रचना को कसने में मेहनत कम की हुई है..इसमें और भी धार आ सकती थी

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  9. मौलिकता की छुंअन लिए हास्य कम व्यंग !

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  10. वाह टीवी ला कर तो बडी मुसीबत हो गई भाई । मजा आ गया पढ कर ।

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  11. बहुत ही सुन्दर. मजा आ गया.

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  12. अच्छी प्रस्तुति।

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  13. ha ha ha ha ...mazedar abhivykti.....

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  14. hahaahahahahahahaa

    jabardast hasye he

    navratan tail ka bhugtbhogi to me bhi hun

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  15. 2 Nov 2009 से 6 अगस्त 2010 की चुप्पी से छोटी है... 1 जून से 29 सितंबर की चुप्पी.....

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  16. बहुत रोचक कविता है........बधाई !

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  17. प्रिय सुनीता शानू जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    आपके यहां हर रंग हैं , बहुत ख़ूबसूरत है आपका ब्लॉग़ ! बस, शिकायत है तो यह कि आपने पोस्ट बहुत दिन से नहीं बदली :)


    कौन घड़ी में भैया हम घर में टीवी लाये ?
    बहुत मज़ेदार रचना है … पहले भी पढ़ कर गया था … आज हस्ताक्षर भी किए हैं … :)


    होली की अग्रिम शुभकामनाओं सहित

    चंद रोज़ पहले आ'कर गए
    विश्व महिला दिवस की हार्दिक बधाई !
    शुभकामनाएं !!
    मंगलकामनाएं !!!

    ♥मां पत्नी बेटी बहन;देवियां हैं,चरणों पर शीश धरो!♥


    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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