चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Sunday, April 8, 2007

हुआ निकम्मा आदमी

क्या कहिए उन इन्सानो से, जिनकी फ़ितरत मक्कारी है…
अपनी ही जेबे भरते रहना, जिनकी पेशेवारी है॥

दोस्ती का जो दम भरते हैं, उम्मीद वफ़ा की करते हैं,
देकर भरोसा अहले वतन को… करते वही गद्दारी है॥

देश के नेता बनते है जो, बात अभिनेता सी करते हैं…
झुठे वादे करते रहना ही, इनकी अदाकारी है॥

भोली-भाली सूरत है इनकी, पर अक्ल बला की रखते है…
हुआ निकम्मा हर वो आदमी, जिसकी मदद ये करते हैं॥

2 comments:

  1. Bahut khub Sunita ji....

    "दोस्त बन के मिले मुझको मिटानेवाले"

    दोस्त बन बन के मिले मुझको मिटानेवाले
    मैं ने देखे हैं कई रंग बदलनेवाले

    तुमने चुप रहकर सितम और भी ढाया मुझ पर
    तुमसे अच्छे हैं मेरे हाल पे हंसनेवाले

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  2. क्या कहिये ऎसे लोगो से जिनकी फ़ितरत छुपी रहे
    असली चेहरा समने आये नकली सुरत छुपी रहे

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