चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Saturday, August 11, 2018

*फिर मिलेंगे*




*फिर मिलेंगे*

ये मिलना मिलाना 
या फिर कहना कि 
फिर मिलना
या मिलने के लिये 
बस कह देना
कि फिर कब मिलोगे
मिलने का एक दस्तूर है बस
मिलने को जो मिलते हैं
वे कहते कब हैं मिलने की
मिल ही जाते हैं मिलने वाले
जिनको चाह है मिलने की
कहने भर से गर कोई मिलता
मिल ही जाता
न रहती उम्मीद की कोई
अब आयेगा, तब आयेगा
शायद शाम ढले 
वो आ पायेगा
या फिर
अटका होगा किसी काम में
या रोक लिया होगा
किसी राह ने
आज नहीं शायद वो
कल आयेगा
आना होता तो आ ही जाता
आने न आने के बीच 
न जाने कितने
बहाने बन जाते हैं
आने वाले आते ही हैं
न आने वाले बस कह जाते हैं
हाँ फिर मिलेंगे
जल्दी ही...

# सुनीताशानू

6 comments:

  1. वाह बहुत सुन्दर

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  2. आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल सोमवार (13-08-2018) को "सावन की है तीज" (चर्चा अंक-3062) पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. *फिर मिलेंगे* , कुछ भी हो, ये शब्द "वह" तो बंधा ही जाते हैं, जिस पर दुनिया कायम है !

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  4. ग़ालिब का एक शेर है कि
    कोई उम्मीद भर नहीं आती
    कोई सूरत नजर नहीं आती।

    न आने वालों के लिए उम्मीद भी मायुष होती है।
    शानदार लेखन

    मेरे ब्लॉग पर स्वागत रहेगा।

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति मन को छू लेने वाली

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स्वागत है आपका...

*फिर मिलेंगे*