चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Wednesday, March 5, 2014

ये ज़िंदगी किताब है...





ये ज़िंदगी किताब है
बस इक हसीन  ख्वाब है
पढ़ी गई, कि छोड़ दी,
आधी पढी ऒ मोड़ दी
जो जान के अंजान है
कहे कि दिल  नादान है
पल-पल यही खिताब है
गलतियाँ बेहिसाब है

खाई कसम ओ तोड़ दी
रंगत भी सब निचोड़ दी
ये छाँव है वो धूप है
ये प्रीत है वो भूख है
चेहरे पे इक नकाब है
फिर भी ये लाजवाब है
ये ज़िंदगी किताब है
बस इक हसीन ख्वाब है...


पा ली कभी खो दी
हँस दी कभी रो ली
छीन ली या बाँट दी
पल में उम्र गुजार दी
प्यार है एतबार है
या बनावटी श्रंगार है
मोतियों सी आब है
ये कुदरती नवाब है


लिपट गई सिमट गई
खुल गई बिखर गई
इश्क है जुनून है
पानी है या खून है
बंदिशो की अजाब है
फिर भी आफ़ताब है
ये ज़िंदगी किताब है
बस इक हसीन ख्वाब है...

शानू

5 comments:

  1. बहुत खूब , खूबसूरत अभिव्यक्ति है !!

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  2. लिपट गई सिमट गई
    खुल गई बिखर गई
    खूबसूरत लाईन है

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