चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Friday, February 22, 2013

मुश्किल होगा ऎ दिल खुद को समझाना...

मेरा बनाया रेखाचित्र (मन पखेरु उड़ चला फिर काव्यसंग्रह से)

कितना मुश्किल है
खुद को समझाना
कि ऎ दिल
खुद से दिल लगाना
उसकी हर बात पर
जो मुस्कुरा देती हूँ
न समझना कि उसे
सचमुच भुला देती हूँ
आंखों की नमी
बता देती है उसे
मेरा रोते-रोते
मुस्कुराना...


जिसको थामे रही
हर पल बांहे मेरी
कितनी दूर तलक ढूँढेंगी
ये निगाहे मेरी
ये सच है कि
हर पल सतायेगा
उसका यूँ
छोड़ के जाना...
जब कभी आयेगी
याद उसे मेरी
ए हवा जरा भी न
दिल दुखाना

हर घड़ी मै ही हूँ
परछाई बन
बस यही राग
तूं उसे सुनाना...
वो हकीकत है
मेरे सपनों की
वो पूँजी है
जीवन भर की
न लूटना 
न समय यूँ
व्यर्थ लुटाना

जो किया है वादा
खुदसे- मुझसे
तुम कभी
भूल न जाना
ये सच है कि
मुश्किल होगा 
ऎ दिल
खुद को समझाना।
शानू

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