चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Tuesday, September 2, 2008

रिश्तों की परिभाषा




रिश्तों की परिभाषा


चँचल मृग-नयनों में बसे, इन अश्को की भाषा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥


कभी-कभी अनजानी सी एक डगर,
पर लगती है कुछ जानी-पहचानी सी,
एक पल में लगता है कोई अपना सा
और हो जाती है हर बात पुरानी सी।


तुम तन से लाख छुपा लो पर, मन की अभिलाषा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥


फ़ासले लाख बढा़यें पर बढ़ नही पाता,
जुदाई में भी इश्क कभी मर नही जाता,
महबूब से जन्नत सी लगती है जिंदगी,
पर तनहाई में एक पल रहा नही जाता।


मुझ बिन उमड़-घुमड़ आई आँखों से,वो जिज्ञासा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥



क्यों पल भर में दूरी बंध जाती है,
एक अनजाने अदृश्य बंधन सी,
फ़िर कैसे बिन मांगे मथ जाती है,
अनचाहे रिश्तों के समुंद्र मंथन सी।


बिन बाँधें बँध जाने वाले इन, रिश्तो की आशा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥


खुद को पाने की कशमकश में,
खो देता है जो अक्सर खुदी को,
ढूँढता फ़िरता है जिस मृग को,
वो बस मिलता है कस्तूरी को,


स्वप्न लोक में मृग-मरीचिका की, घोर निराशा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥

जिन रिश्तों की जड़े होती है हठीली,
टू्टे गमले मॆं भी डाली रहती है गर्विली,
कच्चे धागे से बँधा विश्वास भी टूटता नही,
पानी में भीग गाँठे होती है ज्यादा गठीली,

प्रेम और विश्वास के अभिलाष, प्रेम की अभिप्सा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥

सुनीता शानू

22 comments:

  1. स्वागत है आप बहुत दिनो बाद दिखाई दी :)

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  2. बहुत दिनों बाद .....

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  3. कभी-कभी अनजानी सी एक डगर,
    पर लगती है कुछ जानी-पहचानी सी,
    एक पल में लगता है कोई अपना सा
    और हो जाती है हर बात पुरानी सी।

    बहुत सुंदर रिश्ते की परिभाषा बुनती कविता ..

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  4. जिन रिश्तों की जड़े होती है हठीली,
    टू्टे गमले मॆं भी डाली रहती है गर्विली,
    कच्चे धागे से बँधा विश्वास भी टूटता नही,
    पानी में भीग गाँठे होती है ज्यादा गठीली,
    प्रेम और विश्वास के अभिलाष, प्रेम की अभिप्सा समझा दो।
    किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥
    sunder air sashakt

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  5. "फ़ासला लाख बढा़यें पर बढ़ नही पाता,
    जुदाई में भी इश्क कभी मर नही जाता,
    महबूब से जन्नत सी लगती है जिंदगी,
    पर तनहाई में एक पल रहा नही जाता।


    मुझ बिन उमड़-घुमड़ आई आँखों से,वो जिज्ञासा समझा दो।
    किस-बिधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो"....


    अति सुन्दर......मनमहोक कविता

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  6. संबंधों की परिभाषा तो साहित्यकार दे सका नही.
    रिश्ता होता है एक बोध, जो उगता है बढ़ जाता है
    जो मन से मन के बीच्ज नये भावों के सेतु बनाता है
    जो एकाकी पगडंडी पर मधुरिम आलोक बिछाता है
    जो बंधे नहीं है शब्दों में वे भाव सिक्त कर जाते हैं
    मैं रिश्तों के आयामों को हर रोज विचारा करता हूँ
    छंदों का गीतों से रिश्ता, आंसू का परिणय आंखों से
    रिश्तों का अर्थ बताने में, खुद को असमर्थ समझता हूँ

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  7. बहुत बढिया रचना है।

    कभी-कभी अनजानी सी एक डगर,
    पर लगती है कुछ जानी-पहचानी सी,
    एक पल में लगता है कोई अपना सा
    और हो जाती है हर बात पुरानी सी।

    बहुत सुन्दर!

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  8. प्रेम और विश्वास के अभिलाष, प्रेम की अभिप्सा समझा दो।
    किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो.
    bahut sundar abhivyakti se paripoorn rachana . badhai .

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  9. बहुत दिनो बाद आई हे , ओर आते ही एक सुन्दर कविता,बहुत अच्छा लगा आप का आना ओर आप की कविता.
    धन्यवाद

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  10. तुम तन से लाख छुपा लो पर, मन की अभिलाषा समझा दो।
    किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥
    .
    बहुत सुंदर रचना

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  11. रिश्ते हैं ही ऐसी चीज, जितना इन्हें समझने की कोशिश करो, उतना उलझते जाते हैं और जितना बेफिक्र हो जाओ, उतना ही दुख पहुंचाते हैं।

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  12. Itni khoobsurat kavita...dil ke saare bhav, dard udel kar rakh diye..

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  13. Itani sundar kavita...
    man ko moh gayee...
    Geet ke bhasha dil ko choo gayee..
    shabd antas me chaa gaye...
    yadoon ko sjaa gaye...
    so nice.. heartiest congratulations..

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  14. प्रेम पगी रचना... प्रेम का रिश्ता ही सच है...

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  15. रिश्ता एक अनुभूती है और उसे वो ही मह्सूस कर सकता है जो रिश्तो मे विश्वास रखता हो..

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  16. sunitaji aapki kabit maine padhi jiska sirsak 'riston ki paribhasha ' bahut bahut achchhi lagi
    kya kahu tarif me
    sabd sath nahi deta he.
    thora sa bhi dhyan lagaun to
    apki kabita bula leta he.
    dil se kahta hun
    best1best!your poem is the best.
    sunilkumarsonus@yahoo.com

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  17. बहुत सुन्दर मनोभाव प्रस्तुत किये हैं आपने इस कविता के माद्यम से.. रिश्ते जितने सरल दिखते हैं उतने होते नहीं और कुछ रिश्तों को तो परिभाषित कर पाना असंभव ही है.. कभी अपने पराये और कभी अन्जान अपनो से बढ कर हो जाते हैं

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स्वागत है आपका...