चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Tuesday, April 8, 2008

किस पर किया विश्वास


ऎक कविता के माध्यम से कुछ कहना चाहा है...देखिये सफ़ल भी हुई हूँ कि नही...

फ़िर चली आँधी कि
उड़ चले पत्ते सभी
चरमराया पेड़ ऒ
कुछ डालियाँ भी टूटे तभी


चीं-चीं, चीं-चीं की चीत्कार
जब फ़ैली आकाश में
हो गई तत्काल गुम
किसी अविश्वास में

जैसे गिरा घोंसला उसका
टूट गया विश्वास तभी
टूट गये बंधन के धागे
और मोह के पाश सभी


क्रन्दन तब करती गौरैय्या
थक निढाल होकर बोली
ए आश्रयदाता बतला दे
तूने क्यों ये करी ठिठोली

आश्रय का वादा देकर
मुझे बुलाया था कभी
एक जरा सी आँधी से
भूल गया तू बात सभी


सुनीता शानू

9 comments:

  1. ek choti andhi se ped vada bhul gaya,kuch dard mehsus hota hai,bahut achhi aur safal rachana ke liye bahut badhai.

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  2. सफल रही...बधाई.

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  3. कविता तो हो गयी. अब चाय शाय भी हो जाये तो क्या कहने :-)

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  4. अहो भाग्य हमारे गुरूदेव...आपके साथ बैठ कर चाय पीने का सौभाग्य सभी को नही मिलता...:)

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  5. आश्रय का वादा देकर
    मुझे बुलाया था कभी
    एक जरा सी आँधी से
    भूल गया तू बात सभी
    एक जरा सी आंधी से... बहुत खुब,कया जादु हे आप की कलम मे

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  6. जीवन मे ऐसी आंधियों से ही रिश्तों की मजबूती का पता चलता है..जो छोटी मोटी आंधी ना सह पाये उन रिश्तों का बिखर जाना ही बेहतर होता है...

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  7. शब्द शैली और भाव दोनी ही प्रभावशाली..
    आकाश जी ने भी बहुत गहरी बात कह दी. उसे समझें तो रिश्तों के टूटने का दुख कम हो जाए.

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  8. निराला अंदाज शानू जी...
    पत्ते के साथ टूटे... निभाने की कोशिश लेकिन ब्याकरण की दृष्टि से टूटी होना चाहिए..
    लेकिन छोटी सी बात है.. बाकी बहुत सुंदर.. मन मोहक.. आप को तो अब कवि सम्मेलन में सुनना पड़ेगा.. कभी?

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