चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Wednesday, April 2, 2008

एक गज़ल



अब ये रस्में-मोह्ब्ब्त भुला दीजिये
उनके ख्वाबों को दिल से हटा दीजिये




अश्क आँखों में देकर ये कहते हैं वो
चाहतों को भी अपनी भुला दीजिये


कल ही महफिल में रुसवा किया था हमें
अब वो कहते है हमको वफ़ा दीजिये


अपने ही जिस्म में अब न लगता है मन
उनके दिल को कोई घर नया दीजिये


और कब तक कोई राह देखे भला
जिस्‍म को खाक में अब मिला दीजिये



सुनीता शानू

16 comments:

  1. कल ही महफिल में रुसवा किया था हमें
    अब वो कहते है हमको वफ़ा दिजिये

    वाह! बहुत खूब

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  2. अपने ही जिस्म में अब न लगता है मन
    उनके दिल को कोई घर नया दिजिये

    बहुत खूब। शानू जी दिल को काफी सुकून दिया आपकी गजल ने। लिखते रहिए।

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  3. अपने ही जिस्म में अब न लगता है मन
    उनके दिल को कोई घर नया दिजिये

    waah....! bahut khub...!

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  4. बहुत ही सुन्दर गज़ल

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  5. वर्तनी की अशुद्धियां सुधारियो सुनीता जी । बाकी सब कुछ ठीक है ।

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  6. achchhi gjl hai achchha likha aapne

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  7. अच्‍छी ग़ज़ल है सुनीता जी । और आपने जिस तरह से रंगों से सजा दी है उसको तो और भी अच्‍छी बन पड़ी है

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  8. बहुत खूब भाव हैं और चित्र भी उतना ही उम्दा.बधाई.

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  9. सुनीताजी…

    शब्द आपके हैं लेकिन ग़ज़ल का मज़ा यही है कि
    वह पढ्ने वाले को अपनी दास्तान लगे। जनाब बशीर बद्र साहब कहते हैं कि क़लाम पढते ही वह अवाम की अमानत हो जाता है

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  10. बहुत उम्दा ग़ज़ल. हर शेर बाकमाल. बहुत अच्छा लगा. बधाई.

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  11. क्या बात है, बढ़िया !!

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  12. dil ko chu dene wali gazal hai ,bahut sundar. me bhi ek blog likhne ki kosis kar rahi hu please jarur dekhe

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  13. bahut hi sundar pangtiya hai ,man ko chune wali.me bhi ek blog likhne ki kosis kar rahi hu please jarur dekhe

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  14. मुबारक हो सुनीता जी.. आखिर आपने गज़ल लिखना सीख ही लिया..
    २१२ २१२ २१२ २१२ बहर में ..
    एक अच्छी शुरुआत.. बधाई...

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  15. बहुत ही खुब सुरत...
    कल ही महफिल में रुसवा किया था हमें
    अब वो कहते है हमको वफ़ा दिजिये
    धन्यवाद एक सुन्दर ओर अच्छी गजल के लिये

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  16. This comment has been removed by a blog administrator.

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