चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Thursday, December 24, 2015

खत

बहुत दिन हुए नहीं लिख पाई
लिखती तो तुम भी जान पाते
वो हजारों अनकही बातें
जो रात दिन बुनती हैं ख्वाब
ख्वाब जिसमें होते हो तुम और तुम्हारा खयाल
जब हम मिले थे पिछली दफ़ा
मेरे खयालों की पोटली सिमट गई थी
तुम्हारे इर्द-गिर्द
चुपचाप खामोशी के साथ
लेकिन मै
मै नहीं रह पाई थी खामोश
बतियाती रही तुम्हारी खामोश साँसों से
साँसे जो सड़क पर आये ब्रेकर सी उठती गिरती
बयां करती रही तुम्हारी बेचैनी
तुम शायद घड़ी की सुई से सड़क की दूरी नापते
सुन रहे थे आधी बातें
या फ़िर ठीक से सुन भी न पाये थे
सड़क के या अंदरूनी कोलाहल में
तुम्हारे मेरे दरमियां 
एक बेल्ट का रिश्ता भी होता है
जिसे तुम कभी भूलते नहीं हो
जो न तुम्हे हिलने देता है न मुझे डगमगाने
उसी बंधन में बंधी मैं
बाहर भीतर के कोलाहल से बेफ़िक्र होकर
देखती रही एकटक तुम्हारी ओर
कि तुम पलक झपकाते हुए या गेयर बदलते हुये
देखोगे बगल वाली सीट की ओर... 
मै भी मुस्कुरा दूंगी
या दौड़ती भागती सरपट इस सड़क पर
देख लोगे साइड मिरर में झाँकती मेरी आँखें को
सोचती हूँ
कल जब आओगे मै तुम्हारी सीट के पीछॆ ही बैठूंगी
जब देखोगे तुम बैक व्यू मिरर में
तो देख पाओगे
खिलखिलाती हँसी से सराबोर
इन आँखों को
जो न जाने कब से बहे जा रही हैं
सिर्फ़ तुम्हारे होठों पर एक मुस्कुराहट लाने के लिये...
शानू


3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (25-12-2015) को ""सांता क्यूं हो उदास आज" (चर्चा अंक-2201) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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