चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Friday, January 10, 2014

छिपकली




कितनी बार कहा है
दीवार से चिपकी 
मत सुना कर लोगों की बातें
मगर वो न मानी थी, 
आखिरकार गुस्से मे आ 
हाथ की पँखी से
काट डाली थी पूँछ आम्गुरी लोहारिन ने
कुछ देर बिलबिलाती रही
और शाँत हो गई, 
मगर वो जिद्दी 
पूँछ कटी होकर भी 
सुनती रही लोगों की बातें, 
कितनी बार कहा है धीरे बोला करो, 
वो अबतक 
चिपकी है दीवार से 
मैने कहा था न 
दीवारों के भी कान होते हैं...

शानू

3 comments:

  1. achchi kaita hai chipkali ko prateek maankar jo bomb bane hai ve jivan kai yatharth ko partibimbit karte hai

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  2. खूबसूरत बिम्ब ... गहरी बात ...

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  3. बहुत अच्छी लगी रचना.

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