चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...
Wednesday, January 8, 2014
नही पड़ता फर्क
नही पड़ता फर्क
तेरे कुछ न कहने से
तेरे दूर होने या
पास होकर भी न होने से
किन्तु
होती है बेचैनी
भर जाती हूँ एक अज़ीब सी चुप्पी से
या चहकती हूँ बेवजह मै
कैसी कशमकश है
मुझे खुद से जुदा किये है
फिर भी नही कह पाती
ये खुदकुशी है...
शानू
3 comments:
विभूति"
January 8, 2014 at 6:52 PM
भावो का सुन्दर समायोजन......
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संजय भास्कर
March 5, 2014 at 2:42 PM
बहुत सुन्दर भावमय रचना ....!
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रमा शर्मा, जापान
February 2, 2016 at 9:38 PM
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
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भावो का सुन्दर समायोजन......
ReplyDeleteबहुत सुन्दर भावमय रचना ....!
ReplyDeleteबहुत सुंदर अभिव्यक्ति
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