चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Saturday, July 18, 2009

वो सुन न सके



घूँघट की आड़ से,
आँसुओं की धार में,
पलके छुकाये
वो कहती रही
मगर....
वो सुन न सके

दीवारें सिसकती रहीं
कालीन भीगते रहे
कातर निगाहों से उन्हे
तकते रहे
मगर...
फ़िर भी वो सुन न सके

एक वही थी जो उन्हे
कह सकती थी
बहुत कुछ
मगर...
घर में जोर से बोलने का हक
सिर्फ़ उन्ही को था...

दिन पर दिन
आसुँओ से तरबतर
दीवारे दरक गई
ऒ कालीन फ़ट गये
सब्र का दामन छूटा,
घूँघट हटा, पलके उठी
वो चिल्लाई
मगर...
अब बाबूजी ऊँचा सुनते हैं....


सुनीता शानू

27 comments:

  1. nice post

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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  2. आप बहुत अच्छा लिखती हैं
    सच को बखूबी पेश किया है आपने

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  3. घूँघट हटा, पलके उठी
    वो चिल्लाई
    मगर...
    अब बाबूजी ऊँचा सुनते हैं....

    zindagi ke kuch sach,haqiqat se pare hote hai,hruday ko chu gayi kavita badhai.

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  4. घूँघट हटा, पलके उठी
    वो चिल्लाई
    मगर...
    अब बाबूजी ऊँचा सुनते हैं....

    ऐसे अंत की उम्मीद न थी...

    सुन्दर कविता

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  5. आह्ह!! वेदना के स्वर कभी न पहुँच पाये!! एक घुटन!!


    सुन्दर रचना!

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  6. व्यथा की कथा ---
    अत्यंत मार्मिक ---
    बहुत खूबसूरत

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  7. आखिर आवाज़ का बंद कमरों में घुट कर रह जाना ही नियति है....
    सहज, सुंदर.

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  8. इलाज करवाना था
    जरूर कान खराब रहे होंगे
    इतनी देर काहे लगाई
    पहले ही समझ जाना चाहिए था।

    भविष्‍य में ध्‍यान रखिएगा
    कोई बीमारी न हो
    इसका खुलासा पहले
    कर लिया कीजिए।

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  9. अहा वेदना की जीवंत प्रस्‍तुति जैसे रितिकालीन कवियों नें की.

    सुन्दर कविता. कवि सम्‍मेलनों से किंचित फुरसद निकाल कर ब्‍लाग पर भी नियमित रहा करें सुनीता जी.

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  10. घूँघट हटा, पलके उठी
    वो चिल्लाई
    मगर...
    अब बाबूजी ऊँचा सुनते हैं....
    bahut sundar likha aapne...

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  11. घूँघट हटा, पलके उठी
    वो चिल्लाई
    मगर...
    अब बाबूजी ऊँचा सुनते हैं....
    bahut sundar likha aapne...

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  12. अगर आप हिंदी कविताओं से महज मनोरंजन नहीं मानव जीवन की संवेदनाओं को महसूस करना चाहते हैं ,कविता के साथ हँसना और कविता के साथ रोना चाहते हैं तो आपको सुनीता शानू को पढना होगा ,उनकी कविता उनकी नहीं सबकी कविता होती है ,ये हमारी आपकी किसी की भी हो सकती है और यही एक चीज उन्हें तमाम हिंदी कवियत्रियों से अलग करती है |सरल भाषा में सारी बातें कहने का हुनर जानती हैं सुनीता|बेवजह की क्लिष्टता उन्हें पसंद नहीं और आम पाठक पढना भी नहीं चाहता |उन्हें और उनके शब्दों को मेरी ढेर सारी शुभकामनायें

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  13. दीवारें सिसकती रहीं
    कालीन भीगते रहे
    कातर निगाहों से उन्हे
    तकते रहे
    मगर...
    फ़िर भी वो सुन न सके

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  14. सुनीता जी बहुत अरसे बाद आपकी कोई रचना पढने को मिली...आप हमेशा बहुत अच्छा लिखती हैं...ये रचना भी कमाल की है...बधाई...और हाँ आपके ब्लॉग का प्रस्तुतीकरण बहुत सुन्दर है...
    नीरज

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  15. बिल्कुल सच लिखा है, जब आम भारतीय नारी आवाज उठाने की उम्र तक पहुँचती है, तब तक पुरुष बूढ़ा हो चुका होता है।

    किन्तु जमाना उलट गया है, कुछ दबंग नारियाँ ऐसी भी मिलती हैं, जो ससुराल में कदम रखते ही बुलन्द आवाज में अपना राज दिखाने लगती है, सास-ससुर-पति सब जी-हजूरी करते हुए भी सौ भला-बुरा सुनते रहते हैं।

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  16. इस कविता को पढ़ कर इस धारणा की पुष्टि होती है कि कविता की संवेदनशीलता के बहुत से आयाम ऐसे हैं जो अभी खुले ही नहीं हैं और जिन पर अभी तक सम्यक दृष्टि भी नहीं पडी है. चतुदिक विकास ने संवेदनाओं को सूक्ष्मतर किया है और इसीलिये कविता भी निरंतर सूक्ष्मतर अभिव्यक्तियों को शब्द देती जा रही है.

    यह सर्वकालिक स्थापित मान्यता है कि पीड़ा में से श्रेष्ठ रचना उपजती है. शैलेन्द्र ने इसे यूँ कहा- "है सबसे मधुर वह गीत जिसे हम दर्द के सुर में गाते हैं." पीड़ा शाश्वत है और सृजन चिरंतन; किन्तु इसका अर्थ ये नहीं कि पीड़ा को समग्रतः अभिव्यक्त कर लिया गया है. अभी कितने ही कोने ऐसे हैं जिनमें असंख्य अमूल्य मणियाँ अनाम रूप से विकीर्णित हैं. कविता की संवेदनशीलता के अनछुए आयाम जब तक रहेंगे तब तक कविता भी रहेगी. यह कविता ऐसी ही कुछ मणियों को निकाल कर लाने के प्रयास में सफल रही है. इस दृष्टि से यह एक महत्वपूर्ण कविता है.

    कविता के प्रारंभ में घूघट की आड़ की अभिव्यक्ति जहां एक ओर भारतीय संस्कृति की समृद्ध परम्परा का उन्मोचन करती है वहीं "आंसुओं की धार" और "पलकें झुकाए" उसका कहना उसकी इयत्ता की लड़ाई को मुखर करता है.दीवारों का सिसकना, कालीन का भीगते रहना और कातर निगाहों से उन्हे तकते रहना पारंपरिक पीड़ा को नए सन्दर्भ,नई शब्दावली और नई ऊष्मा के साथ नया अभिव्यंजन है.कविता के अंत में आसुँओ से तरबतर दीवारों का दरकना और कालीनों का फटना संघर्ष की विजय-गाथा कहते हैं.

    यह कविता अपने अभिधेयार्थ में नहीं पढी जाना चाहिए. इसकी बिम्बात्मकता के प्रकाश में अप्रस्तुत के अस्तित्व की सहजीवी प्रतिच्छवियाँ अपने पूरे उत्स पर हैं.

    समकालीन कविता अपने बहुआयामी सरोकारों, चिंताओं और संघर्षों के बीच सतत प्रवाहशील है. यह कविता भी अपनी पूरी सार्थकता और शिद्दत से युग की ईमानदार पड़ताल करती है.

    और रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी-

    सादर-
    आनंदकृष्ण, जबलपुर
    http://www.hindi-nikash.blogspot.com

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  17. आप का वापिस आना हिंदी सहित्य और हम जैसे आपके प्रिय मित्रों के लिए बहुत ही सुखद है...
    आप की कविता पढ़ी...फिर पढ़ने का मन किया.. फिर से पढ़ी...
    फिर पढ़ने का मन किया ...फिर पढ़ी...
    बार बार पढ़ी...सांकेतिक भाषा में... आप ने जो लिख दिया...बहुत गहरी बात है...
    उम्र गुजर गई...और अपनी बात न कह सकी वह....
    आप को सादर नमन...
    कुलवंत सिंह

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  18. सुन्दर भाव अभिव्यक्ति..समय बदल रहा है.. मूक रह कर ना सुनने वाले सुनने लगे हैं..दीवारें भी दरकने के डर से कान खोल कर खडी हैं..

    झलक दिखला कर गायब न हो जाईयेगा

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  19. सुनीता जी:

    बहुत दिनो बाद लिखा लेकिन बहुत अच्छा लिखा. कविता के माध्यम से आपने एक भारतीय नारी की विवशता और घुटन का मार्मिक वर्णन किया है. भारत मे अभी भी अनगिनत नारियां है जो जोर से बोलने का तो क्या, अपना घूंघट हटाने का साहस भी नही जुटा पाती और अपने आंसुओं की बाढ मे डूब कर दम तोङ देती हैं. आपकी ये कविता उन बेजुबान नारियों को समर्पित की जानी चाहिये.

    सादर

    आकाश

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  20. सब्र का दामन छूटा,
    घूँघट हटा, पलके उठी
    वो चिल्लाई
    मगर...
    अब बाबूजी ऊँचा सुनते हैं....
    आपकी इस कविता से मै प्रभावित हुआ। सुन्दर!!!

    आभार/ मगल भावनाऐ

    हे! प्रभु यह तेरापन्थ
    मुम्बई-टाईगर
    SELECTION & COLLECTION

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  21. बहुत बढ़िया
    परकुछ लोग सुनने के बावजूद भी अन सुना करदेते है

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  22. मार्मिक.......... बहुत ही लाजवाब है आपकी कवित.......... मन को छू गयी ..... जीवन के सत्य को का आइना दिखाती रचना

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  23. aapki ye kavita man ko chu gayi

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  24. sunita
    aapne samaj ki rudhita ki ore dhyan dilane ke bahane
    es kavita ko kai arton mein dhala hai ..na keh pane ki vivbasta kewal rudhiyon ke karan tak hi simit nahi rehti hai ,deewaron ka siskana ,kaleen ka bheegna ,aur unka na sun pana ...bahut gehre tak choo jata hai ...ghar ka mukhitya yani satta

    satta ka nata saqdiyon se esi tarah se janta ke saath reha hai ...sadiyon se janta majbbooor hai aur unke gharoo ki deeware siskt sikte ab darkne lagi hai ...wah aapne ant bhi to acha bata diya ..ki ab to hume satta se kuch bhi aas nahi lagani chahiye kyunki wah behri ho chuki hai .....

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  25. sunitaji aapki rachnyein bahut jeewant hain.kripya mere blog par bhi
    padhariye .main bhi ek chota sa kavi hoon.namaskaar

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  26. दिन पर दिन
    आसुँओ से तरबतर
    दीवारे दरक गई
    ऒ कालीन फ़ट गये
    सब्र का दामन छूटा,
    घूँघट हटा, पलके उठी
    वो चिल्लाई
    मगर...
    अब बाबूजी ऊँचा सुनते हैं....
    KHOOB LIKHA
    KBHI MERE BLOG PAR BHI AAYIYE

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स्वागत है आपका...