चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Tuesday, June 16, 2020

छुपे हुए ख़त

मोहब्बत के अवशेष
सब कुछ खत्म होने के बाद भी
कुछ अवशेष बचे रह जाते हैं 
जो बताते हैं कि खत्म कुछ नहीं होता
रबर से मिटाने पर भी काग़ज़ पर
अक्षर अपना निशान छोड़ जाते हैं
वैसे ही तुम्हारा आना और
मेरी प्रोफाइल में झांकना दर्ज होगा एक सदी में
कि यह तुम्हारे सकुशल होने का संदेश भर है
जब कभी सोशल मीडिया की फाइलें खंगाली जाएंगी
न जाने कितने प्रेम पत्र मिलेंगे 
कुछ सेव कुछ डिलीट किए 
कुछ छूट गए होंगे 
तुम्हें जवाब देने की प्रतिक्षा में
ये अवशेष मोहब्बत की नई दास्तान सुनाएंगे
इन्हें कम मत आंकिए 
यह किसी की अंतिम सांसों का हिसाब होंगे
इनमें जी रही होगी एक सभ्यता
जो खामोशी से दफ़न हो गई होगी
यह हरगिज़ कम नहीं होंगे
मोहन-जोदड़ो या हड़प्पा की खुदाई से मिले अवशेषों से भी।

11 comments:

  1. ये तो तब होगा जब गूगल महोदय इस इनेक्टिव अकाउंट को सालों साल न हटाए ... पर सच है ये भी एक निशान है जो बहुत कुछ कहेगा ...

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  2. बहुत बढ़िया लेकिन ये जासूसी नहीं चलेगी 😊😊

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  3. बहुत ख़ूब। सोशल मीडिया पर उपस्थिति सकुशल होने का प्रमाण है और क्रियाकलाप उसके धरोहर। और यह हिसाब किताब गूगल बाबा रखते हैं। न जाने कब हमारी संस्कृति सभ्यता की याद में यह सबूत बने।

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  4. सादर नमस्कार,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार
    (19-06-2020) को
    "पल-पल रंग बदल रहा, चीन चल रहा चाल" (चर्चा अंक-3737)
    पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

    "मीना भारद्वाज"

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  5. ये भी बताएँगे कभी कि इमारत बुलंद थी

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  6. वाह बहुत खूब गजब चिंतन।

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  7. वाह ! बहुत ख़ूब आदरणीय दीदी .

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स्वागत है आपका...

अंतिम सत्य