चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...
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Friday, April 13, 2012

ऎ कामवाली तुम्हे बस कामवाली ही बने रहना है...


google se sabhar



हल्लो कौन!
घरवाली?
नही मै कामवाली….
खट
और कनैक्शन कट
लेकिन मै जानती हूँ तुम्हारी उपयोगिता
सच कहूँ
तुम्हारे होने से
घरवाली का ठाठ-बाठ
उसका सजना सँवरना हो पाता है
नख से शीश तक सजी-धजी वह
डरती है 
तुम कहीं अवकाश न ले लो
तुम् अपने सिर दर्द, बदन दर्द की 
परवाह किये बिना
दो कप चाय पीकर
लगा देती हो सिर में तेल
मल देती हो कमर भी

गुदड़ी में छिपे लाल सी
खूबसूरती तुम्हारी
छिपी रहती है
बेतरतीब उलझे बालों और
मैली कुचैली पेबंद लगी साड़ी
या पसीने से उठती दुर्गंध
के बीच
मगर फिर भी
कुछ भी आपत्तिजनक नही होता
लेकिन हाँ
भूल कर भी मत चली आना
केश संवार कर
या इस्त्री किये कपड़े पहन कर
काम से हटा दी जाओगी
इर्ष्यावश या भयवश

घरवाली के सौंदर्य का खयाल रख तुम्हें
बने रहना है पूर्ववत
कामवाली तुम्हे बस काम से मतलब रखना है
तुम्हारा पति 
तुम्हारे बच्चे 
तुम्हारा सजना सँवरना
शाम होने और दिन निकलने के
बीच का मामला है
तुम जानती हो

बेचारी, गरीब, अनपढ़
सभी नाम तुम पर फ़बते हैं मगर,
पढ़ी-लिखी खूबसूरत जवान कामवालियाँ
शिकार हो जाती हैं
किसी की हवस का
या फ़िर रह जाती हैं बेरोजगार

सुनो!
तुम्हारी ढकी-छुपी अप्रतिम सुंदरता
बन सकती है तुम्हारी दुश्मन
ये मैली कुचैली साड़ी,
तुम्हारे चारों तरफ़ लिपटी ये पसीनें की दुर्गंध
रक्षाकवच है तुम्हारा
इस आवरण से निकल कर
झाँकने की कोशिश भी
तुम्हे कामवाली रहने नही देगी
लेकिन
तुम फ़िक्र मत करो
घर का बचा खाना
मेरे और बाबूजी के पुराने कपड़े
बच्चों के पुराने कपड़े और खिलौने
सब दूँगी तुम्हे
पगार भी बढ़ा दूँगी मगर
ऎ कामवाली 
तुम्हे बस
कामवाली ही बने रहना है...

Thursday, April 12, 2012

भूल जाईये बीते कल को आगे बढ़ना ही नियति है...




कृपया क्षमा करें कुछ मित्रों को मुझे परेशान देख बहुत दुख हुआ। रोना धोना और चिल्लाना मेरी यह फ़ितरत भी नही अतः यह कविता यहाँ से हटा रही हूँ...

Thursday, July 14, 2011

दुनिया बदलने की खबर



कहीं सुनी तो होगी
कहकहों के शोर में
किसी के सिसकने की आवाज
तेज़ हँसी के बीच किसी की
खामोश मुस्कुराहट
कहीं दूर जब
कोई सितारा टूटता होगा
मचलती होंगी सैंकड़ो ख्वाहिशें
लेकिन
नहीं होगा अहसास उसकी
टूटन का
कहीं घुट गई होगी चीख
किसी अजन्मे की
गर्भ में ही
या फ़िर
सियारों के शोर और
कूड़े के ढेर में दबकर
रह गया होगा
क्रंदन किसी
नाज़ायज या नामुराद का
कब सोचा होगा
किसी ने
बहलाते,फुसलाते,सहलाते
हैवानियत के ये हाथ
रौंद देंगे किसी
मासूम का बचपन
या किसी गुनहगार की
बुलंद आवाज के नीचे
दब कर रह गई होगी
किसी बेगुनाह की बेगुनाही
कहीं सुना तो होगा
तोड ली गई कलियाँ
भून डाला तंदूर में
हँसता, खिलखिलाता
बचपन
क्या शीशे सी पिघल रही है
कानों में
एक ओर कसाब के
जन्म की किलकारियाँ
सुन भी रही है
तेज़ धमाकों में
आतंक के नाचने-गाने की धुन
क्यों हो रहा है शोर
चिथड़े-चिथड़े होती
मानवता का
क्यों नहीं सुनाई पड़ रही कहीं
दुनिया बदलने की खबर...

Wednesday, October 27, 2010

दर्द का दवा हो जाना




उसने कहा दर्द बहुत है
जाने क्यों मै भी कराहती रही
न सोई न जागी
रात भर दर्द को पुकारती रही
उसने कहा ये दर्द
उसका अपना हो गया है
उसके साथ सोता है
जागता है रात भर
मुझसे अधिक वही तो
रहता है उसके खयालों मे
बस यही बात
मेरे मन को सालती रही
ये दर्द लगता है
अपनी हद पार कर गया
झलकता था जो आँखों से उसकी
आज सीने में उतर गया
मेरी तमाम कोशिशे
मुझे मुह चिढाती रही
बेदर्द तो है दर्द
बेवफ़ा भी हो जाता काश
छटपटाता,करवट बदलता
जाने कैसे-कैसे
मन को मै मनाती रही
किन्तु
बहुत मुश्किल है दर्द का
बेवफ़ा हो जाना
हद से गुजरना दवा हो जाना।

सुनीता शानू

अंतिम सत्य