चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...
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Thursday, June 28, 2007

"ए दोस्त"

"ए दोस्त"

तुम जानते हो,

तुम्हारी हर बात,

मेरी जिन्दगी के,

मायने बदल देती है,

तुम्हारी हर बात,

प्रेरणा होती है,

उस पल,

जब मै अकेले में,

सिसक रही होती हूँ...

जिन्दगी से हार कर,

मै जानती हूँ,

उन विषम परिस्थितीयों में,

तुम कुछ भी नही कर सकते,

मेरे लिये,

और यह भी कि,

सहना ही पड़ेगा मुझको यह सब,

अकेले,

मगर फ़िर भी,

मुझे चाहत रहती है,

सदैव,

तुम्हारी उपस्थिती की,

तुम्हारी मौजूदगी की,

तुम्हारे होने का यह

"अहसास"

मुझमे चाहत भर देता है,

जीने की

और रास्ता बनाता है,

उन कठिन परिस्थितियों से,

उभर आने का,

सभंल जाने का...

अंतिम सत्य