चंद बासी रोटियां
किसी बासी याद की तरह
पड़ी रही थी रात भर
छुआ तो लगा कि
कुछ नमी सी है अभी
शायद रात-भर रोई थी
या इनकी गर्मी ही
इनपर बरस रही थी पानी बनकर
जो बचाए हुए थी सुबह तक
इनको कठोर होने से
मैंने भी बासी रोटियां उठाई
सहलाई कि जाया नहीं होने दूंगी इनकी ख़ुशबू
बचा लूंगी इनकी नमी को
जैसे कुछ रिश्तों को बचाने की कोशिश भी
करती रहती हूं मैं
नमी सूखने और कठोर होने तक।
सुनीता शानू
बहुत अच्छी कविता के लिए साधुवाद । सांध्य दैनिक "मुखरित मौन में" में इस कविता की अनुगूँज तथा डॉ रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" जी की चर्चा में सम्मिलित होने के लिए बहुत बहुत बधाई-अभिनंदन ।
ReplyDeleteजैसे कुछ रिश्तों को बचाने की कोशिश भी
ReplyDeleteकरती रहती हूं मैं
नमी सूखने और कठोर होने तक।
बहुत बढ़िया सुनीता जी !
मन में नमी हो तो हर बासी चीज़ फिर चाहे रिश्ते हों या रोटी ... बची रहती है ...
ReplyDeleteरिश्तों को बचाने की कोशिश
ReplyDeleteरोटी हो या रिश्ते थोड़ी नमी तो बचा कर ही रखनी होती है ताकि नष्ट न हो. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता !!
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