चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...
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Saturday, September 11, 2010

एक विचार (कविता)





कभी-कभी आत्मा के गर्भ में,
रह जाते हैं कुछ अंश-
दुखदायी अतीत के,
जो उम्र के साथ-साथ,
फलते-फूलते-
लिपटे रहते हैं-
अमर बेल की मानिंद...


अमर बेल-
जो 
पीडित आत्मा को सूखा कर-
बनादेती है ठूँठ
ठूँठ 
जिसपर-
नही होता असर-
खुशियों की बरसात का
जिस पर नही पनपती
उम्मीद कोई...


ये दुखदायी अतीत के अंश
होते है जंमांध 
और कुँठित मन
सुन नही पाता
बदलते वक्त की आहट
कह भी नही पाता
मन की कड़वाहट


क्योंकि
इनकी काली परछाई
नही छोड़ती कभी
आत्मा को अकेले
सालती रहती हैं-
टीस बन कर
उम्र भर--


सुनीता शानू





अंतिम सत्य