चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Thursday, April 16, 2020

पंछी तुम कैसे गाते हो


              पंछी ! तुम कैसे गाते हो-?
अपने सारे संघर्षों मे तुम-
              कैसे गीत सुनाते हो-?
जब अपने पंखों को फ़ैला-
तुम आसमान में उड़ते हो।
तब कोई न तुमको रोक सके-
तुम सीधे प्रभु से जुड़ते हो।

पर बोलो-! किस ताकत से तुम 
           यह इंद्रजाल फैलाते हो-?
           पंछी ! तुम कैसे गाते हो-?

बच्चे राह देखते होंगें-
यह चिंता विह्वल कर देती।
पर उनकी आँखों की आशा
पंखों को चंचल कर देती।
तुम महा विजेता बनकर जब
            दाना लेकर घर आते हो।
            पंछी ! तुम कैसे गाते हो?
अपने सारे विद्रूपों में-
जीने की ऎसी अभिलाषा-!
पीड़ा के महायुद्ध में भी
माधुर्यमयी ऎसी भाषा
पंछी तुम छोटे हो कर भी-
            जीवन का सार बताते हो।
            पंछी-! तुम कैसे गाते हो-?
सुनीता शानू

3 comments:

  1. अरे वाह इसका कंपोजीशन तैयार करवाने में अपनी म्यूजिक इंस्ट्रक्टर को दे देता हूं उनका नाम है डॉक्टर शिप्रा सुल्लेरे आप गूगल कीजिए आपको आनंद आ जाएगा उनके काम को देख कर मुझे अनुमति दीजिए कि बच्चे सजाएं बहुत बढ़िया गीत है चरण स्पर्श

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  2. जीवन का सार बताने वाला ही ऐसा गा सकता है.

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  3. बहुत अच्छी लगीं यह पंक्तियाँ।

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स्वागत है आपका...

अंतिम सत्य