चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Tuesday, November 3, 2015

तुम से "मै"

दिन बहुत हुये...
दिन नहीं साल हुये हैं
हाँ सालों की ही बातें है
जाने कितनी मुलाक़ातें है
गिन सकते हैं हम उँगलियों पर लेकिन
दिन...महिने...साल...
गिन लेने के बाद भी
गिनकर बता सकोगे!
बाल से भी बारीक उन लम्हों को 
जो बिताये है तुम्हारे साथ 
और साथ बिताने के इंतज़ार में 
ढुलकते आँसुओं का सूख जाना
लेकिन आज
उम्र के साथ और भी गहरे में
बैठ गया है तुम्हारा प्यार 
बेचैनी बढ़ जाने से 
आँखें ज्यादा नमीदार हो गई है
हाँ इंतज़ार आज भी उतना ही है
मेरे तुम से मिलने का
क्योकि तुमने ही कहा था एक दिन
मुझसे पूरे होते हो तुम 
और तुमसे मैं
तभी से मै 
मेरे भीतर बसे "तुम" से मिलकर 
हर दिन पूर्ण हो जाती हूँ...।
शानू


Monday, June 23, 2014

मेरे अल्फ़ाज़ बस मेरे हैं...



दोस्तों फ़ेसबुक पर विचित्र- विचित्र लोग बैठे हैंं, इधर उधर से कुछ भी उठाते हैं और लाइक शेयर बटोरते हैं, अभी एक महाशय  ने कहा कि क्या मै आपके अल्फ़ाज़ से बनी कविता मेरे नाम से पोस्ट कर सकता हूँ तो एक बार मैने सोचा क्या हर्ज़ है करने में, लेकिन मेरे ये अल्फ़ाज़ किसी खास के लिये थे... कैसे मै किसी ओर को अपने नाम से दे सकूंगी? उसने यह भी कहा कि आपकी वॉल पर कम कमैंट आये हैं शेयर भी तीन ही लोगों ने किया। मै अपने नाम से करके देखना चाहता हूँ या यूं समझे की दिखाना चाहता हूँ मुझे कितने कमैंट या शेयर आते हैं। दोस्तों आपका लाइक करना या शेयर करना आपके मेरे शब्दों से होकर गुजरने से कम नहीं है। पाठक को परखने का नहीं समझने का नजरिया चाहिये। लेकिन दिल मेरा है अल्फ़ाज़ मेरे हैं किसी ओर को उसका दायित्व हर्गिज़ नहीं दे सकती। मेरे अल्फ़ाज़ मेरी ही शैली में...

क्यों लगता है ऎसा
सब कुछ है पास मगर
कुछ भी नहीं है...
तू पास होकर भी 
क्यों पास नहीं है...
क्यों लगता है ऎसा
मेरी परछाई भी अब
मुझको डराती है
क्यों एक साँस विश्वास की
खोल देती है मुझको
परत दर परत
क्यों खामोशी आँखों की
साथ नहीं देती
मेरी तेज़ चलती जुबाँ का
क्यों लगता है ऎसा
हर लम्हा महफ़िल सा है
फिर भी तनहा है।
शानू

Friday, March 14, 2014

अधिकार या...




बनिये की बीवी बनियाईन
पंडित की बीवी पंडिताईन
या कहें कि
पति पर पत्नी का अधिकार
या फिर पत्नी को विरासत मे प्राप्त
ऎसी कुर्सी
जो मिल गई ब्याहता बनते ही
कुछ भी कहेंगें...
लेकिन 
खुद को
डॉक्टर की बीवी डॉक्टरनी
मास्टर की बीवी मास्टरनी
कहलाने वाली पत्नियाँ
उतारी जा सकती हैं
कभी भी
इस पद से
इस अस्थायी कुर्सी से
अनपढ़, गँवार, ज़ाहिल कह कर
अपमानित होकर
क्योंकि
खुद को घर, पति और बच्चों के बीच
होम करती स्त्री 
नहीं सोच पाती इतनी गहराई से
कि उसे भी चुनने होंगे
रास्ते अपने
मंजिले अपनी
स्वाभिमान के साथ
क्योंकि आज के परिवेक्ष में
गाड़ी के दोनों पहिये
हर तरह से
समान होने आवश्यक हैं।

शानू

Wednesday, March 5, 2014

ये ज़िंदगी किताब है...





ये ज़िंदगी किताब है
बस इक हसीन  ख्वाब है
पढ़ी गई, कि छोड़ दी,
आधी पढी ऒ मोड़ दी
जो जान के अंजान है
कहे कि दिल  नादान है
पल-पल यही खिताब है
गलतियाँ बेहिसाब है

खाई कसम ओ तोड़ दी
रंगत भी सब निचोड़ दी
ये छाँव है वो धूप है
ये प्रीत है वो भूख है
चेहरे पे इक नकाब है
फिर भी ये लाजवाब है
ये ज़िंदगी किताब है
बस इक हसीन ख्वाब है...


पा ली कभी खो दी
हँस दी कभी रो ली
छीन ली या बाँट दी
पल में उम्र गुजार दी
प्यार है एतबार है
या बनावटी श्रंगार है
मोतियों सी आब है
ये कुदरती नवाब है


लिपट गई सिमट गई
खुल गई बिखर गई
इश्क है जुनून है
पानी है या खून है
बंदिशो की अजाब है
फिर भी आफ़ताब है
ये ज़िंदगी किताब है
बस इक हसीन ख्वाब है...

शानू

Sunday, March 2, 2014

एक हॉस्य कविता



जब से सिमट गया है
सारा घर मोबाइल में
इमोशन खो गये हैं 
व्वाट्स अप की स्माइल में
बच्चे सामने आने से 
कतराते हैं
अब बस मोबाइल पर ही
बतियाते हैं
पहले यदा-कदा
प्यार भरे दो बोल 
कह दिया करते थे
डाल गले में बाहें
झूल लिया करते थे
अब तो मोबाइल पर ही
मुस्कुराते हैं
टाटा बाय-बाय
हाथ हिलाते है
बस लव यू मम्मा
कह पाते हैं....
शानू

Friday, January 10, 2014

छिपकली




कितनी बार कहा है
दीवार से चिपकी 
मत सुना कर लोगों की बातें
मगर वो न मानी थी, 
आखिरकार गुस्से मे आ 
हाथ की पँखी से
काट डाली थी पूँछ आम्गुरी लोहारिन ने
कुछ देर बिलबिलाती रही
और शाँत हो गई, 
मगर वो जिद्दी 
पूँछ कटी होकर भी 
सुनती रही लोगों की बातें, 
कितनी बार कहा है धीरे बोला करो, 
वो अबतक 
चिपकी है दीवार से 
मैने कहा था न 
दीवारों के भी कान होते हैं...

शानू

Wednesday, January 8, 2014

नही पड़ता फर्क





नही पड़ता फर्क 
तेरे कुछ न कहने से
तेरे दूर होने या 
पास होकर भी न होने से
किन्तु 
होती है बेचैनी
भर जाती हूँ एक अज़ीब सी चुप्पी से
या चहकती हूँ बेवजह मै
कैसी कशमकश है 
मुझे खुद से जुदा किये है
फिर भी नही कह पाती
ये खुदकुशी है...

शानू

Monday, December 30, 2013

कसम



कसम

कसम खाई थी दोनों ने,
एक ने अल्लाह की-
एक ने भगवान की-
दोनों ही डरते थे,
अल्लाह से भगवान से
मगर...
उससे भी अधिक डर था उन्हें
खुद के झूठे हो जाने का,
उस पाक परवर दिगार से-
मुआफ़ी माँग ली जायेगी
कभी भी
अकेले में॥

Thursday, December 26, 2013

तेरी किस्मत बाबू

कल बड़े दिन की खुशी में हम भूल गये उन सड़क किनारे के बच्चों को जिनके आगे से न जाने कितने सांता गाड़ियों में आये और रेड लाईट से होकर गुजर गये। उसी एक वाकये पर यह कविता लिखी है...देखिये जरा...




तेरी किस्मत बाबू
थोड़ा सा दे दो..
मेरी क्रिसमस...
नही… तेरी किस्मत
नही बच्ची कहो मेरी क्रिसमस
मगर कैसे कहे वो मेरी क्रिसमस
सान्ता आया था
गाड़ी में बैठ कर
कभी इस नेता के घर
कभी उस अभिनेता के घर
गाड़ी के शीशे पर गंदले हाथों से
थाप देती रही
मांगती रही वो बच्ची
कहती रही
बाबू आज तेरी किस्मत है
मुझे भी दे दो थोड़ा सा कुछ
मगर फ़ुर्सत नही
उस सांता बने बाबू को
इतना भरा था थोली में
लेकिन नही आता था नज़र
थोड़ा सा
झोली के किसी कौने में भी...:(

सुनीता शानू

Thursday, September 26, 2013

खामोशी से बरस गया

आज बहुत तेज़ बारीश आई बस यूँही लिख डाला एक पैगाम  उस आवारा बादल के नाम जो एक हवा के झोंके से कहीं भी बरस जाता है...


गुगल से साभार





बहुत दिनों से
घुटन सी
घिर आई थी
कली-कली भी
कुम्हलाई थी
प्यास कोई एक
भटक रही थी
धरती सी
बिन पानी के तड़प  रही थी
रुकी-रुकी सी सांसों ने
आधी-अधूरी बातों ने
जाने क्या समझाया
कि
न वादा तोड़ा न साथ चला
बस खामोशी से बरस गया...
शानू

Saturday, September 21, 2013

फिर आई एक याद पुरानी...

ये वो कविता है जिसे हिन्दी के अक्षरों में लिखने में बहुत समय लग गया था। मै देवनागरी से परीचित नही थी और बहुत मुश्किल से सुषा फोंट्स का जुगाड़ कर लिख पाई थी। इसके बाद कृति देव और अब बराहा देवनागरी :) बहुत ही आसान हो गया है हिन्दी लिखना...बहुता पुरानी कविता है जिसे पुराने ई कविता ग्रुप के लोगों ने पढ़ा और सराहा भी था... तथा कमिया भी बताई थी।



Ref :-102_sunita         DATE_05.08.2006

ना जाने क्या हो जाता है ...

ना जाने क्या हो जाता है...आती है जब याद तेरी...
दिल खो जाता है... जाने क्या हो जाता है...

तनहा-तनहा दिन कटते हैं, तनहा-तनहा राते है ;
तनहा-तनहा मन है मेरा... तनहाई मे बातें हैं ।
तेरे आने की खुशी में...जाने कब वक्त कट जाता है
जाने क्या हो जाता है,

जबसे तुझसे लगन लगी है...एक तस्वीर बसी है मन में,
रातों में तेरे सपने हैं...एक हुक जगी है तन में।
तुझको पाने की चाहत में...दिल बाग-बाग हो जाता है
जाने क्या हो जाता है...

कल मुलाकात हुई तुमसे तो...दिल को कोई होश नही है
तन-मन मेरा  ऎसे डोले,..आंखें भी खामोश नही हैं।
बेचैनी बड. जाने से...दिल को रोग लग जाता है।
जाने क्या हो जाता है...

...गर है मरहम कोई तो...इस दिल को आज दवा देदो,
मायूस ना हो जाये ...दिल में थोङी जगह देदों।
मिल जाने दो दिल को दिल से...दिल आज मेहरबां हो जाता है,
ना जाने क्या हो जाता है...

सुनीता चोटिया   
 (सुनीता शानू)


Tuesday, September 10, 2013

कहानी की कविता

दोस्तों एक कहानी लिखी है "एक अकेली" कहानी के भीतर की कविता यहाँ प्रस्तुत है ये खत कहानी की नायिका सौम्या ने अपने प्रेमी शेखर को लिखा था उसी खत का थोड़ा सा अंश प्रस्तुत है...

आज पहली बार चली हूँ दो कदम

तुम्हारे बिन

आज पहली बार कुछ किया है मैने

तुमसे कहे बिन

तुम्हारी नाराजगी या तुम्हारी हाँ की

परवाह किये बगैर

प्यार में हद से ज्यादा परवाह कहीं

बंदिशे तो नहीं...

शायद आज तुम भी सोच पाओगे जीना

मेरे बिन

पहल मैने कर दी है और शुरुआत भी

मेरी ही थी....
सुनीता शानू

Monday, July 8, 2013

मन पखेरु के विमोचन पर रुठे साथी...

मन पखेरु का विमोचन न हुआ बीरबल की खिचड़ी बन गई जिसे सुनीता जी पकाये जा रही हैं...पकाये जा रही हैं। क्यों यही सोच रहे थे न आप?  :)  देखा आखिर मैने आपके मन की बात भी पढ़ ही ली है। खैर खाने को तो तैयार हैं न खिचड़ी... 

तो दोस्तों बात शुरु होती है तब से जब मेरे दिल में कविताओं को एकत्र करने का कोई इरादा ही नही था। दोस्तों की कविताओं की किताबें देखना पढ़ना अच्छा लगता था। 
लेकिन कुछ दोस्तों की मेहनत और मुझसे अपेक्षायें मेरे इस काव्य-संग्रह की वजह बन गई। ये संग्रह उन सभी दोस्तों का ऋणी है।

मैने पहला विमोचन पिलानी में किया था। दूसरा दिल्ली के कॉंस्टीट्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हॉल में हुआ। जाने कितनी उम्मीदें आशाएं जुड़ी थी मेरे इस कार्यक्रम से बता नही सकती। सभी दोस्त इस तरह रुठे थे जैसे बेटे की शादी में जाने से पहले बराती रुठ जायें। जो दोस्त लम्बी-लम्बी साँसे भर के दोस्ती का दम भरते थे। आज उन्हे शिकायत थी कि मैने फ़ोन क्यों नही किया।फ़ेसबुक पर ही मैसेज़ दे दिया।
अच्छा है न ऎसे समय पर ही पता चलता है। 
शिकायतें तो बहुत सारी है... लम्बी लिस्ट है.नाम गिगने लगी न तो बस...




मंच पर काव्य-पाठ तो बीसियों बार किया था। हर बार सामने बैठे दर्शकों की भीड ही देखी थी किन्तु ये भीड़ जो नज़र आ रही थी उन तमाम दोस्तों की थी जो ये जानते थे कि उनके होने का मेरी ज़िंदगी में बहुत  महत्व है जो उन्हें मेरे गीत में मेरी आवाज़ में नज़र भी आया था। कई बार हम कुछ लोगों को बहुत दूर समझते हैं लेकिन वक्त आने पर वही सबसे पास नज़र आते हैं। प्रभात प्रकाशन से पियुष अग्रवाल  तथा अयन प्रकाशन से भोपाल सूदद ्ने आकर ये साबित भी कर दिया।



इस प्रोग्राम को सफ़ल बनाने में पवन जी ने( मेरे पति) पूरी मेहनत की थी। मुझे लगता था कि जैसे ये उन्हीं का सपना है जो आज साकार होने जा रहा था। भीड़ में कुछ जानी-मानी हस्तियाँ भी थी जिनका आना सौभाग्य की बात थी। कुछ लोग बस विमोचन तक रुके थे भोजन नही कर पाये। परंतु उनका आना किसी उपलब्धि से कम नही था।  ... तो दोस्तों मन पखेरु उड़ चला का दूसरा विमोचन भी बहुत ही खूबसूरत हुआ। इसका श्रेय शैलेश को भी जाता है जो मेरे और पवन जी से एक ऎसे स्नेह बंधन में बधा है जिसका टूटना मुश्किल है।

मेरी खुशी में शामिल थे प्रताप सोमवंशी जी पत्नी तथा बच्चे को ही नही अपने साथ लाये थे ढेर सारी शुभकामनाएं। आनन्द कृष्ण जी तथा ललित भाई मेरे घर ही ठहरे थे। उनका आना मेरे घर परिवार को अपना बना लेना था। दूर से आने वालों में सिध्देश्वर जी भी थे।... आप जानते हैं मै सिध्देश्वर जी को बहुत गुसैल समझा करती थी। लेकिन उनसे दोस्ती होना सौभाग्य की बात है।

नन्हा सा अमन जिसे मै बहुत सालों से जानती हूँ आया और अपनी मघुर आवाज़ में गीत भी सुनाया। आने वालों में प्यारी सखी अंजु भी थी। मुझे लगता नही था वो आयेगी मगर वो आई और गई भी सबसे आखिर में।

दिल्ली,फ़रीदाबाद,नोयडा से आने वालों की एक लम्बी लिस्ट थी, नाम लेते लेते सुबह से शाम हो जायेगी। मै बहुत खुश हूँ सचमुच मै अपने दोस्तों के साथ बहुत खुश हूँ जिन्होने मेरा कार्यक्रम अपना समझा और मेरी दोस्ती को दिल में स्थान दिया।






मैत्रेयी जी ने कहा कि हर लेखक पहले कवि होता है बाद में कुछ और होता है। दिल को सुकून मिला सुन कर वरना तो घर में कवि का होना बहुत अपशकुन की बात समझा जाता है भैया। कवि को देखते ही लोग भाग खड़े होते हैं। जैसे भूत लिपट गया हो। :)



अब सोच रहें है कि हम सड़क पर बैठे क्या कर रहे हैं... अजी अगला विमोचन कहाँ होगा बस यही योजना बना रहे हैं। अब रोज-रोज किताब थोड़े ही लिखते रहेंगें। हाँ पार्टी-शार्टी होती रहनी चाहिये।

 पोस्ट लिखते-लिखते दो महिने हो गये। आज पोस्ट करने का मतलब समझते हैं न आप। मतलब की समय बीत जाये तो बीत जाये। उम्र बीत जाये तो जाये... मन बूढा नही होना चाहिये... मन पखेरु लो फ़िर उड़ चला...

राम-राम जी की...
सुनीता शानू

Sunday, May 26, 2013

मन पखेरु उड़ चला फिर काव्य-संग्रह के लोकार्पण पर एक विशेष रिपोर्ट... (1)


“मन पखेरु उड़ चला फिर” मेरी इकलौती पुस्तक का एक बार नही दो बार विमोचन हुआ। बहुत ही निराली बात है दोस्तों लेकिन मुझ जैसे निराले लोगों से आप उम्मीद कर ही क्या सकते थे?
 

अब बात आती है बहुत सारी बातों की कि रिपोर्ट छप गई समीक्षाऎं हो गई। यानि की जो होना था हो चुका अब खबर बासी हुई। तो मन पखेरु पर ताज़ा क्यों लगी। तो भैया हमें तो आदत है बाल की खाल उधेड़ने की जब तक सारी बातें साफ़ न हो जाये चैन कैसे आये...
  ये 27 अप्रैल का दिन था जब राजस्थान पिलानी में मन पखेरु का लोकार्पण हुआ। आदरणीय गुरुजी केसरी कान्त जी शर्मा के द्वारा दीप प्रज्जवलन के साथ ही कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ।
 
 
पिलानी में लोकार्पण करवाने का एक ही मकसद था मै पिलानी में जन्मी हूँ मेरे माता-पिता पिलानी में है मेरे गुरु श्री केसरी कान्त जी शर्मा भी पिलानी के पास एक जगह है मंडावा वही रहते हैं जो राजस्थान के एक बहुत बड़े लेखक है जिन्होनें अनेक किताबें लिखी है राजस्थानी में अनुवाद किये हैं।
 

दोस्तों इस दिन मेरे माता-पिता की शादी की तरेपन्नवी सालगिरह भी मनाई गई थी। मेरे लिये ये क्षण किसी उत्सव से कम नही थे। जब आप मेरी पुस्तक मन पखेरु पढेंगे तो जान पायेंगे मेरे माता-पिता की मेरे अपनों की मेरी ज़िंदगी में क्या भूमिका रही है। खैर इस आयोजन में मन पखेरु पर सभी जाने-माने विद्वजनों ने अपनी बात रखी। इस अवसर पर मैने अपनी सबसे प्रथम क्लास टीचर तारा नौवाल मैडम को शाल भेँट कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया।
 

अन्त में काव्य-गौष्ठी तथा भोजन के साथ ही कार्यक्रम का समापन कर दिया गया।
 

अब बात आती है नया क्या था, नया था... पिलानी में कार्यक्रम करना  जहां से बाईस साल पहले मै दिल्ली आ गई थी|  वहाँ कार्यक्रम कैसे और किस प्रकार से किया जायेगा। पिलानी में सभी मुझे लेखिका तथा कवयित्री सुनीता शानू के नाम से जानते थे। कुछ लोग ही जानते थे कि मै पिलानी  की ही बेटी हूँ और उस दिन सबके सामने ये बात उजागर भी हो गई। पिलानी  में एक इंसान ने शुरु से आखिर तक बहुत मदद की  वो है संजय शर्मा... मरुपन्ना का सम्पादक।
 
 
 लेकिन उसमें एक खास  बात  है कि वह  कब किस समय किस बात पर नाराज हो जाये मालूम नही। तो दोस्तों मुझसे भी वो ऎसे समय पर नाराज़ हो गया जब प्रोग्राम में कुछ ही दिन रह गये थे।  मुझे समझ नही आया कि क्या किया जाये। प्रोग्राम तो होना ही था मगर वो इंसान जो शुरु से साथ था अचानक गुस्सा हो जाये और प्रोग्राम में नज़र ही न आये अज़ीब सी बात थी। सबसे बड़ी बात मै रिश्ते में उसकी मामी भी लगती हूँ भला कैसे छोड़ देती उसे उसकी जिद के साथ। सो जाकर उसे मनाया और सचमुच वो भी बच्चों की तरह मान गया। रिश्ते कितने प्यारे अपने से होते हैं जब हम ज़िंदगी में रिश्तों की अहमियत को समझते हैं।


ऎसे ही दोस्ती के रिश्ते में बँधे पिलानी तक चले आये मेरे कुछ दोस्त जिनमें सबसे पहले नम्बर पर पहुंचे संतोष त्रिवेदी जी ( जिन्हें बात-बात पर महाराज कहने की आदत है)
 
 
इसके साथ ही शैलेश , पवन जी, और बच्चे भी पहुंच गये।
 
 
 
और अंत में ज्योतिर्मय जी भी अपना आशीर्वाद देनें पहुंच गये।
 
 
 
 छोटे से शहर पिलानी में कवियों और श्रोताओं का जमावड़ा इस कदर हुआ दोस्तों की भीड देख कर आँखें भर आई। मै दिल से शुक्रगुजार हूँ अपनी पिलानी की जिसने मन पखेरुं को उड़ने के लिये पख दिये और उसकी उड़ान को अपना आशीर्वाद दिया।

इस तरह मन पखेरु के विमोचन का पहला पड़ाव खत्म हुआ...
 
इंतजार कीजिये अगले पड़ाव का...
शुभ-रात्री
शानू

 

Saturday, March 30, 2013

जवाब भी तो मेरे अनुरुप होंगें...



ऊँ नमः शिवाय...

मेरे और तुम्हारे बीच
एक मौन पसरा हुआ है
अनन्तकाल से
मगर फिर भी 
मै समझती हूँ, तुम्हारे इस
मौन की परिभाषा
मेरे हर सवाल पर-
तुम मौन ही रहते हो-
क्योंकि तुम जानते हो-
जवाब भी तो-
मुझे मेरे अनुरुप ही चाहिये

तुम कुछ पूछते नही
मगर मै सब बताती हूँ तुम्हें
मुझे पता है तुम्हारी ये चुप्पी भी
मेरी हाँ मे हाँ ही होगी
मगर फिर भी
कुछ तो होगा अन्त
इस चुप्पी का
कब तुम्हारे पथरीले होंठ
हिलेंगे और तुम बाहर आओगे
इस गहरे मौन से
अनन्तकाल से बस मै ही
कर रही हूँ सवालों पर सवाल
और जवाब?
बस मेरे ही होते हैं...

शानू

Tuesday, March 26, 2013

हुये तुम मेरे मै तुम्हारी होली…


होली मुबारक हो आप सभी को...

रंगों की होली सजायें रगोंली
हुये तुम मेरे मै तुम्हारी होली…

आओ मिटा दें दूरियाँ दिलों से
ज़िंदगी सजा दें आज रंगों से
भुला दें गिले-शिकवे सारे औ’
रंगों की होली सजायें रगोंली
हुये तुम मेरे मै तुम्हारी होली…

ज़िंदगी की बाज़ी लगा दी मगर
न हम हारे न तुम जीत पाये
चलो आज कहना ये मेरा मानों
छोड़ के नफ़रतों की दुनियाँ औ’
खुशी के रंगों से सजायें रंगोली
हुये तुम मेरे मै तुम्हारी होली…

Friday, March 1, 2013

उसने कहा तो लिख डाला...

कहोगे कि कोई नया संग्रह बन रहा है या कोई बात है? किसी से प्यार का चक्कर तो नही। अब बताओ  ये तमाम बातें होंगी क्या तभी कविता बनेगी। ये फ़ेसबुक भी बड़ी अज़ीब जगह है दोस्तों... न लिखने दे न पढ़े आखिर कोई करे तो क्या करे :(

दो चार ठौ कविता बन पड़ी सो है सो यहीं पर ठेले जा रहे हैं... :)



उसने कहा तुम्हारी हँसी में 
मुझे दर्द सा क्यों लगता है?
क्या बेवजह कोई 
इतना हँसता है?
मुझे भी लगा किस बात पर 
हँस रही हूँ मैं!
कि राज़ दिल के सबको
कह रही हूँ मै--
किसी की याद हद से ज्यादा आने लगे
कोई अंदर से गहरा सताने लगे
तो ऎ दिल
कोशिश कर
खुद को समझाने की
कोशिश कर
खुद को हँसाने की...
शानू( बस यूँही) एक उदास शाम... मै... और..मेरी चाय :)





(२)


बस यही परिणति है 

किसी के मासूम एहसासों की
कि सिसकी बन के 
शीशे सी पिघलती रही याद सीनें में
और कहीं दूर उसे
खबर तक न हो पाई...

(३)


जमीं पर ही चलते देखा है अभी तक
मेरे पैरो के पँखों को तुमने देखा नही है
ऎ आसमाँ इतना गुरुर भी अच्छा नही
मेरे हौसलों की उड़ान अभी बाकी है...


शानू

Saturday, February 23, 2013

व्यंग्य नरक में डिस्काऊंट ऑफ़र का कविता रुप


सुप्रभात मित्रों... सुबह-सुबह माथा खराब हो उससे पहले चलिये कुछ हॉस्य हो जाये... :)

सेल की दुकान देखते देखते
एक आदमी 
नरक के दरवाजे आ गया
यमराज को देख घबरा गया
बोला हे महाराज
इतनी जल्दी क्यों मुझे बुलाया
अभी तो मेरा समय नही आया
यमराज बोला 
तुम्हें बुलाया नही गया है
तुम खुद चले आये हो 
लालच मे फ़ँस कर
हमने जो नाइनटी पर्सेंट ऑफ़र का
बोर्ड लगाया
ऎ मानव तूं उसी में फँसा आया
पर हुजूर नरक तो है यातना गृह जैसा
फिर ये ऑफ़र ये डिस्काऊँट कैसा???
यम्रराज झल्लाया
अरे क्या हमे मूर्ख समझ रखा है
तुम रोज अपनी रणनीति बदलते हो
नये-नये ऑफ़र देते हो
और तो और सुना है
आजकल तुहारी जेलो मे
कैदियों को मोबाईल से लेकर एसी तक
सारे सुख मिलते हैं
तुमने चोरो अपराधियों को इतना सम्मान दिया है कि
आजकल वो टी वी पर दिखते हैं 
छोटे चोर हो या बड़े चोर
सब अपना कैरियर बनाते हैं
इसीलिये हमने
ये तरीका अपनाया है
सेल का ऑफ़र दे
तुम्हें बुलाया है
और सोच विचार कर
विशेष फ़ेसिलिटी देने का निश्चय किया है
ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग परिवार सहित
नरक मे आयेऔर 
हमारे नरक का नाम रोशन करें
अच्छा ऎसी बात है
तो क्या ऑफ़र है बताईये
यमराज बोला
जवान आने वाले के साथ
एक के साथ एक फ़्री होगा
रूम विद अकोमोडेशन मिलेगा
फ़ार्म धरती पर भिजवा दिये गये हैं
जो जल्दी भर देगा उसका नम्बर पहला
आदमी फोरन रहने के लिये तैयार हो गया
बोला मै तो शरीफ़ आदमी हूँ सरकार
चोरो के लिये वार्ड अलग बने होंगे न
उन्हे तो आप जरूर यातना ग्रह में डालेंगे
यमराज बोला अरे मानव 
तू सचमुच पक्का बिजनेस मैन है रे
तेरी धरती पर भी
क्या चोरो का मुह काला होता है
क्या अब भी उन्हे गधे पे बिठाया जाता है
आजकल चोर तो वाह वाह करते नजर आते हैं
चोरी करके इनाम पाते है
चोरो के करिश्मे इतने मशहूर हुए हैं
कि चोर सेलिब्रिटी बन जाते हैं
जब तुम्हे चोरो को अपनाने में एतराज नही तो हमें क्यूं होगा
हमने फ़ैसला किया है
धरती के जैसे ही यमराज की जेल
पूरी तरह से सुख सुविधाओं से लैस होगी
ताकि प्रकृति के नियम को न बदले आदमी
समय-समय पर नरक में भी आ जा सके
आदमी खुशी से झूम उठ
पूरे परिवार के साथ स्पेशल डिस्काऊँट पा गया
धरती से दौड़ता हुआ नरक में आ गया 
शानू 
( मेरे व्यंग्य नरक में डिस्काऊंट ऑफ़र का कविता रुप)

Friday, February 22, 2013

मुश्किल होगा ऎ दिल खुद को समझाना...

मेरा बनाया रेखाचित्र (मन पखेरु उड़ चला फिर काव्यसंग्रह से)

कितना मुश्किल है
खुद को समझाना
कि ऎ दिल
खुद से दिल लगाना
उसकी हर बात पर
जो मुस्कुरा देती हूँ
न समझना कि उसे
सचमुच भुला देती हूँ
आंखों की नमी
बता देती है उसे
मेरा रोते-रोते
मुस्कुराना...


जिसको थामे रही
हर पल बांहे मेरी
कितनी दूर तलक ढूँढेंगी
ये निगाहे मेरी
ये सच है कि
हर पल सतायेगा
उसका यूँ
छोड़ के जाना...
जब कभी आयेगी
याद उसे मेरी
ए हवा जरा भी न
दिल दुखाना

हर घड़ी मै ही हूँ
परछाई बन
बस यही राग
तूं उसे सुनाना...
वो हकीकत है
मेरे सपनों की
वो पूँजी है
जीवन भर की
न लूटना 
न समय यूँ
व्यर्थ लुटाना

जो किया है वादा
खुदसे- मुझसे
तुम कभी
भूल न जाना
ये सच है कि
मुश्किल होगा 
ऎ दिल
खुद को समझाना।
शानू

अंतिम सत्य