चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Friday, September 5, 2008

और मै रूठ पाऊँ...



चिट्ठाजगत
-हर रोज-
-दिन निकलने के साथ-
-मेरे पास होते हैं कई सवाल-
-तुम्हारे लिये-
-खोज-खोज कर-
-सहेज लेती हूँ उन्हे-
-कि तुम्हारे कुछ कहने से पहले ही-
-पूछूंगी तुमसे-
-उन सवालों के जवाब-
-परंतु मेरे कुछ कहने से पहले ही-
-तुम समझ जाते हो-
-मेरी हर बात-
-और बिन कहे ही-
-रख देते हो जवाबों का पुलिंदा-
-मेरे हाथों में और-
-तुम्हारी मीठी-मीठी-
-बातों का जादू-
-समेट देता है मुझे-
-मेरे शब्दो के साथ-
-चिपक जाती है जीभ तालू में-
-और सोचती हूँ-
-आखिर झगडा़ किस बात पर हो-
-कि तुम मुझे मनाओ-
-और मै रूठ पाऊँ...
सुनीता शानू

Tuesday, September 2, 2008

रिश्तों की परिभाषा




रिश्तों की परिभाषा


चँचल मृग-नयनों में बसे, इन अश्को की भाषा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥


कभी-कभी अनजानी सी एक डगर,
पर लगती है कुछ जानी-पहचानी सी,
एक पल में लगता है कोई अपना सा
और हो जाती है हर बात पुरानी सी।


तुम तन से लाख छुपा लो पर, मन की अभिलाषा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥


फ़ासले लाख बढा़यें पर बढ़ नही पाता,
जुदाई में भी इश्क कभी मर नही जाता,
महबूब से जन्नत सी लगती है जिंदगी,
पर तनहाई में एक पल रहा नही जाता।


मुझ बिन उमड़-घुमड़ आई आँखों से,वो जिज्ञासा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥



क्यों पल भर में दूरी बंध जाती है,
एक अनजाने अदृश्य बंधन सी,
फ़िर कैसे बिन मांगे मथ जाती है,
अनचाहे रिश्तों के समुंद्र मंथन सी।


बिन बाँधें बँध जाने वाले इन, रिश्तो की आशा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥


खुद को पाने की कशमकश में,
खो देता है जो अक्सर खुदी को,
ढूँढता फ़िरता है जिस मृग को,
वो बस मिलता है कस्तूरी को,


स्वप्न लोक में मृग-मरीचिका की, घोर निराशा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥

जिन रिश्तों की जड़े होती है हठीली,
टू्टे गमले मॆं भी डाली रहती है गर्विली,
कच्चे धागे से बँधा विश्वास भी टूटता नही,
पानी में भीग गाँठे होती है ज्यादा गठीली,

प्रेम और विश्वास के अभिलाष, प्रेम की अभिप्सा समझा दो।
किस-विधि नापोगे प्यार मेरा, रिश्तों की परिभाषा समझा दो॥

सुनीता शानू

Tuesday, August 12, 2008

प्यार की पहली बारिश








एक मुद्दत से कुछ लिख नही पाई हूँ,आज एक प्रयास किया है,बस और कुछ नही...



वो उतरी है जिस रोज आसमान से
रिम-झिम सावन की फ़ुहार बनके
झिलमिलाती रही ऎसे आँगन में मेरे
असंख्य मोतियों का श्रृंगार बनके।




छूती हूँ जब भी मै होठों से उसे
महक उठती हूँ सोंधी बयार बनके
चमकती रही ऎसे जीवन में मेरे
आई हो खुशियों का संसार बनके।




एक नन्ही सी बूँद मिली जब उसे
खिल गई हर कली बहार बन के
मुस्कुराई फ़िर ऎसे गजरे में मेरे
सज गई हो जूही का हार बनके।




चाँद की खामोशी खली फ़िर उसे
चमकी बादल में अंगार बनके
बरसती रही ऎसे मधुबन में मेरे
सावन की पहली बौछार बनके।




अहसास प्रेम का हुआ जब उसे
बह चली आँसुओं की धार बनके
पिघलती रही वो हृदय मे मेरे
प्रियतम का पहला प्यार बनके...






सुनीता शानू





Tuesday, May 6, 2008

जबलपुर की यात्रा...

एक छोटा सा शहर जबलपुर...क्या कहने!!!
न न न लगता है हमे अपने शब्द वापिस लेने होंगे वरना छोटा कहे जाने पर जबलपुर वाले हमसे खफ़ा हो ही जायेंगे...:) तो दोस्तों एक खूबसूरत महानगर जबलपुर...
गये तो थे हम हकीम साहेब से ससुर जी का इलाज़ करवाने
मगर स्टेशन पर ही पकड़े गये कवि महोदय के द्वारा...उन्होने बड़ी गर्म जोशी के साथ हमारा स्वागत किया...तमाम स्थानीय अखबारों के साथ जिनमें खबर थी एक कवि सम्मेलन की और सम्मेलन में था हमारा नाम...:) ये कवि कोई और नही सुप्रसिध्द गीतकार और समीक्षक

श्री आनन्द कृष्ण थे...




इसके बाद मिले हम हमारे बच्चों से जो जबलपुर में ही रह कर पढ़ाई कर रहे है...हमारी दीदी के बच्चें...यानी की हम हुए मौसी...:)
शाम को हुआ कवि सम्मेलन जिसमें जाने माने कवि विराजमान हुए...

ये लीजिये कौन कहता है कि बच्चों में प्रतिभा नही होती...जबलपुर का तो बच्चा-बच्चा कवि है..तभी तो यह नन्हा कवि मंच पर आकर माईक झपट रहा है...अरे उसे भी सुना लेने दो भाई...

(मनीष तिवारी जी व उनके सुपुत्र)
सुनाये बिना तो मानेगा नही देखिये जरा उसे फ़िक्र नही है कपड़ो की मगर कविता की दशा सुधारनी जरूरी है...


(गीतकार कवि युसुफ़ व नन्हे कवि तिवारी)
और सम्मेलन के बाद आनंद जी की सहधर्मिणी के हाथ से बना सुस्वादिष्ट भोजन मिला और खोये की जलेबी किसकी तारीफ़ करें भाभी जी की या भोजन की समझ नही पा रहे...



और दूसरा दिन...
चलिये चला जाये भेडा़ घाट...


ये है हमारी टीम...सारे बच्चे एक मौसी...और अंत में बैठा है एक और बच्चा...जो हमें जबलपुर मे ही मिला...



(आदित्य,आशा,मै सुनीता,पिंकी,व रिचा)

(सुमित ,रिचा,आदित्य व पिंटु)

जीहाँ ये है आदित्य नई दुनिया में एक्जीक्यूटिव... जो आये तो थे हमें जबलपुर घुमाने मगर बच्चों के साथ मिलकर हमें मौसी कहने लगे...देखिये जिन्दगी क्या-क्या रंग दिखाती है...बेगाने भी बन जाते है अपने...


(आदित्य श्रीवास्तव)



चलिये विदा दीजिये हमें जबलपुर वालो....


आँखों में नमी होठों पे मुस्कान है,

क्या यही जबलपुर की पहचान है...




ये मैं हमारे कोच के साथी स्टीफ़न एंड बिलियर्ड हार्वे फ़्राम अमेरिका...


सुनीता शानू









मौसी


बरसों से प्यासी धरती पर
उगा हो जैसे नन्हा पौधा,
बड़े प्यार से उसने मुझको
मौसी माँ जैसी जब बोला...
हुई सरसराहट कानों में तब
जैसे अमृत सा रस घोला,
लगा अंक से मैने उसको
जब प्यार से बेटा बोला...
एक जन्म का नही ये रिश्ता
लगता है सदियों पुराना,
जन्मा नही है तेरी कोख से,
किन्तु माँ मैने तुझको माना...

सुनीता शानू ( मन की एक भावना है जिसे मैने एक छोटी सी कविता का रूप दिया है)

Tuesday, April 8, 2008

धरती का गीत


धरती पर फ़ैली है,सरसों की धूप-सी
धरती बन आई है, नवरंगी रूपसी ॥


फ़ूट पड़े मिट्टी से सपनों के रंग
नाच उठी सरसों भी गेहूं के संग।
मक्की के आटे में गूंथा विश्वास
वासंती रंगत से दमक उठे अंग।


धरती के बेटों की आन-बान भूप-सी
धरती बन आई है,नवरंगी रूपसी॥


बाजरे की कलगी-सी, नाच उठी देह
आँखों में कौंध गया, बिजली-सा नेह।
सोने की नथनी और, भारी पाजेब-
छम-छम की लय पर तब थिरकेगा गेह।


धरती-सी गृहणी की,कामना अनूप-सी
धरती बन आई है, नवरंगी रूपसी॥


धरती ने दे डाले अनगिन उपहार,
फ़िर भी मन रीता है,पीर है अपार।
सूने हैं खेत और, खाली खलिहान-
प्रियतम के साथ बिना जग है निस्सार।


धरती की हूक उठी जल-रीते कूप-सी
धरती बन आई है नवरंगी रूपसी॥

सुनीता शानू

किस पर किया विश्वास


ऎक कविता के माध्यम से कुछ कहना चाहा है...देखिये सफ़ल भी हुई हूँ कि नही...

फ़िर चली आँधी कि
उड़ चले पत्ते सभी
चरमराया पेड़ ऒ
कुछ डालियाँ भी टूटे तभी


चीं-चीं, चीं-चीं की चीत्कार
जब फ़ैली आकाश में
हो गई तत्काल गुम
किसी अविश्वास में

जैसे गिरा घोंसला उसका
टूट गया विश्वास तभी
टूट गये बंधन के धागे
और मोह के पाश सभी


क्रन्दन तब करती गौरैय्या
थक निढाल होकर बोली
ए आश्रयदाता बतला दे
तूने क्यों ये करी ठिठोली

आश्रय का वादा देकर
मुझे बुलाया था कभी
एक जरा सी आँधी से
भूल गया तू बात सभी


सुनीता शानू

Wednesday, April 2, 2008

एक गज़ल



अब ये रस्में-मोह्ब्ब्त भुला दीजिये
उनके ख्वाबों को दिल से हटा दीजिये




अश्क आँखों में देकर ये कहते हैं वो
चाहतों को भी अपनी भुला दीजिये


कल ही महफिल में रुसवा किया था हमें
अब वो कहते है हमको वफ़ा दीजिये


अपने ही जिस्म में अब न लगता है मन
उनके दिल को कोई घर नया दीजिये


और कब तक कोई राह देखे भला
जिस्‍म को खाक में अब मिला दीजिये



सुनीता शानू

Thursday, March 27, 2008

पलकें बंद हो गई...


आँखों ने आँखों से कह दिया सब कुछ

मगर जुबाँ खामोश रही...

जब दिल ने दिल की सुनी आवाज़

धड़कन खामोश रही...

आँखो के रास्ते दिल में उतरने वाले

ऎ मुसाफ़िर

अब बाहर जा नही सकते

तुम्हारे प्यार की खुशबू से तृप्त

उठती गिरती साँसे देख कर

अब पलके बंद हो गई...

सुनीता शानू

Monday, March 24, 2008

एक कविता....

दोस्तों कल एक कविता सुनाने का मौका मिला ...आपके सामने प्रस्तुत है...


आज़ादी की होली

पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानों ने होली


आज सजा है सर पे उनके बलिदानो का सेहरा
चाँद सितारों से मिलता है नादानों का चेहरा
आँख में आँसू आ जाते है देख के सूरत भोली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


महक उठी है आजादी हर धड़कन हर साँस में
छा गई है मस्ती एसी आज़ादी की आस में
नया सवेरा लाने निकली परवानो की टोली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


मर कर भी जिन्दा रहते है देश पे मिटने वाले
सर पर बाँध कफ़न आये है आज़ादी के मतवाले
आज लगा दी सबने अपने अरमानो की बोली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


आज चले है माँ के प्यारे देश की आन बचाने
जान हथेली पर ले आये आजादी के परवाने
हँसते-हसँते चढ़े फ़ाँसी पर हिम्मत भी न डोली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


सुखदेव,भगत सिंह,राजगुरू ने जो दिया बलिदान
ऋणी रहेगा सदा तुम्हारा सारा हिन्दुस्तान
नमन उन्हे है जिन वीरो ने खेली खून की होली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


सुनीता शानू

Saturday, March 22, 2008

फ़ागुन आया झूम के...

दोस्तों होली का त्यौहार आप सबके जीवन में खुशियाँ लाये यही मनोकामना है...

भंग की तरंग

ढोलक और मॄदंग

होली के रंग

नाचे संग-संग .....




फ़ागुन के दोहे


डाल-डाल टेसू खिले,आया है मधुमास,
मै हूँ बैठी राह में,पिया मिलन की आस।
हो रे पिया मिलन की आस



फ़ागुन आया झूम के ऋतु वसन्त के साथ
तन-मन हर्षित हों रहे,मोदक दोनो हाथ
हो रे मोदक दोनो हाथ



मधुकर लेके आ गया, होठों से मकरंद
गाल गुलाबी हो गये, हो गई पलकें बंद।
हो रे हो गई पलकें बंद



पिघले सोने सा हुआ,दोपहरी का रंग
और सुहागे सा बना,नूतन प्रणय प्रसंग
हो रे नूतन प्रणय प्रसंग



अंग-अंग में उठ रही मीठी-मीठी आस
टूटेगा अब आज तो तन-मन का उपवास
हो रे तन-मन का उपवास



इन्द्र धनुष के रंग में रंगी पिया मै आज
संग तुम्हारे नाचती , हो बेसुध बे साज
हो रे हो बेसुध बे साज



तितली जैसी मैं उड़ू चढ़ा फ़ाग का रंग
गत आगत विस्मृत हुई,चढी नेह की भंग
हो रे चढ़ी नेह की भंग



रंग अबीर गुलाल से,धरती भई सतरंग
भीगी चुनरी रंग में,हो गई अंगिया तंग
हो रे हो गई अंगिया तंग



गली-गली रंगत भरी,कली-कली सुकुमार
छली-छली सी रह गई,भली भली सी नार
हो रे भली-भली सी नार



सुनीता शानू




Friday, March 7, 2008

मै और तुम

एक औरत और नदी में क्या अन्तर है?
क्या उसका अपना अस्तित्व बाकी रहता है समुन्दर रूपी पुरूष से मिलकर ?

क्या विवाह के बाद भी वह, वह रह पाती है जो पहले थी?
क्यों उसे ही बदलना पड़ता है, यहाँ तक की जन्म से जुड़ा नाम तक बदल जाता है...





-मै और तुम-

-बँध गये हैं एक अदृश्य बंधन में...

-कितने शान्त और गम्भीर हो तुम-

-समन्दर की तरह...

-और मै शीतल,चँचल,-

-बहती नदी सी-

- बहे जा रही हूँ निरन्तर...

-और तुम मेरी प्रतिक्षा में खड़े हो-

-अपनी विशाल बाहें फ़ैलाये-

-मेरे आते ही तुम्हारी भावनाये-

- हिलोरे लेने लगती है-

-लहरों की तरह-

-और मुझे सम्पूर्ण पाकर...

-हो जाते हो शान्त तुम भी-

-मै जानती हूँ...

-मै अब तक मै ही हूँ-

-किन्तु...

-जिस दिन तुमसे मिल जाऊँगी-

-तुम बन जाऊँगी-

सुनीता शानू



Thursday, February 14, 2008

वेलन्टाईन डे...

वेलन्टाईन डे पर संत वेलनटाईन को मेरी श्रद्धांजली....


रोक सकेगा कौन इन्हे
ये आंधी और तूफ़ान है
चल रहे है भेड़ चाल ये
आजकल के नौजवान है...

पहले पहल ये परफ़्यूम देकर
अपना प्यार दिखाते है
किस डे पर भी किस देकर
सबसे प्यार जताते है
हग डे पर भी गले मिलकर
बन जाते है अपने से
वेलन्टाईन डे पर इनके
पूरे हो जाते है सपने

प्यार घूमाना प्यार फ़िराना
प्यार ही इनका मुकाम है
रोक सकेगा कौन इन्हे
ये आँधी और तूफ़ान हैं

बीत गया समय पुराना
आज चलन है इनका
भूल गये सब रिश्ते-नाते
नया दौर फ़ैशन का
गर्ल फ़्रेंड की जी हुजूरी
यही कर्तव्य है इनका
एक छूटी दूजी बनाई
यही धर्म है इनका

माँ की डाँट पिता का पहरा
इनके लिये अपमान है
रोक सकेगा कौन इन्हे
ये आँधी और तूफ़ान है

बालो पर जो हाथ घुमाये
वो माँ इन्हे न भाती है
अनुशासन की सीख दे
वो बात इन्हे सताती है
कैसे गुरू कहाँ का चेला
सब बने संगी-साथी है
जैसी दिक्षा वैसी शिक्षा
सब गुड़-गौबर-माटी है

खुशी मनाएं वेलन्टाईन की
जिसने दिया बलिदान है
रोक सकेगा कौन इन्हे
ये आँधी और तूफ़ान है...

सुनीता शानू

Sunday, January 27, 2008

कुछ पुरानी यादें...

कुछ पुरानी यादें...धूमिल न हो जाये...आईये ले चले कुछ हँसने -हँसाने...
आज हम भी कोशिश करते है ... तस्वीरे क्या बोलती है...

कौन कहता है कि मुझमे लचक नही...
मुसाफ़िर भाई ध्यान से कहीं कमर में झटका न आ जाये...:)




खलिश भाई यह आपके लिये ही है...


देखिये तस्वीर अच्छी आनी चाहिये...:)




गुरूदेव प्रणाम!







न न न गुरूदेव से पंगा हर्गिज नही...





नही वापिस न दें आपके लिये ही है...



राजीव भाई अब आपके साथ पंगा कौन लेगा...



जाने आपने क्या जादू किया है नीलिमा जी सब हँस रहे है...


अगर कमर में दर्द है तो पहले बताते न विनोद भाई...:)







माईक दूर रहने से आवाज सही नही आती...:)





घबरा मत अक्षय बेटा अच्छी तरह से पढ़ यहाँ किसी को कविता याद नही है सब देखकर पढेंगे...:)




कैसी बातें करते है आप भी कविता हाथ में है मगर देख नही रहा...:)





मेरे तो हाथ में बहुत तेज़ दर्द हो गया रात भर कविता लिखते-लिखते


हम किसी से कम नही है भैया देख लेना...






न न न ससुर जी से मजाक नही


रे निखिल क्या सारी डायरी आज ही पढोगे?


मै भी सुना ही दूँ क्या एक कविता...





समझ नही आ रहा क्या लिखा है...:)


क्षमा गुरूदेव

क्या सुनना पसंद करोगे?



यहाँ भी पंगा...:)




यह माईक मुझे बेहद पसंद है...


ध्यान से सुनिये...


एक और कविता की गुजारिश है...



हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कृपया तालियाँ अवश्य बजायें


क्षमा करें संतोष जी


गुरूदेव आपके काव्य-पाठ में पटाखे क्यूँ छोड़े जा रहे थे?






देखा आपका भी जवाब नही कुँवर साहब...आपकी आवाज ने सबको बाँध दिया

Sunday, January 20, 2008

ओह! भूल गया

दोस्तो रोजमर्रा की जिन्दगी में कहीं आप भी कुछ भूले तो नही? अगर लगता है कुछ भूल रहे है तो हो सकता है याद आ ही जाये आपको भी... एक छोटी सी पेशकश है...


-घर से ऑफ़िस-
-ऑफ़िस से घर-
-आते जाते-
-हमेशा भूल जाता हूँ...
-मगर आज सब याद है-
-बेटा ये लो तुम्हारा चॉकलेट-
-ठीक है न-
-मुन्नी तुम्हारी गुड़ीया भी-
-और तुम्हारी यह लाल साड़ी-
-हाँ लाल ही लानी थी न...
-देखा...मुझे सब याद है-
-है न-
-बेटा.... बहुत दिनों से दर्द है-
-अब सहन नही होता-
-क्या आज डॉक्टर से अपाईंटमेंट ले लिया...?
-ओह्ह! .....बाबूजी... आज फ़िर भूल गया-
-मेरी याददास्त को जाने क्या हो गया है...

सुनीता शानू
-

Wednesday, January 9, 2008

माँ की व्यथा

दोस्तों मेरी यह कविता १३ तारीख को रेडियो द्वारा राष्ट्रीय प्रसारण दिल्ली केंद्र से प्रसारित होगी...रेडियो या अखबार जिसे शायद आज सब भूल गये हैं मगर हर खासोआम के दिल तक पँहुचता है आज भी रेडियो और अखबार...:) ... कृपया आज ही खरीद कर लाईये एक छोटा सा रेडियो और सुनिये आपके प्रिय कवि की दर्द भरी कविता...:)

देख कर लाल की खूबसूरत छवि,
मन ही मन बावरी मुस्काती रही,
डर न जाये कहीं मेरा लाडला...
मुँह आँचल से अपना छिपाती रही।


मगर एक दिन ये हवा जो चली,
ले उड़ी आँचल वो पकड़ती रही,
देख कर लाल तो डर ही गया...
मै माँ हूँ... तेरी वो बताती रही।


पोंछ कर आँसू आँखे छिपाती रही,
खुद को नजरों से खुद की गिराती रही,
आँसूओं लग न जाये बददुआ लाल को,
दोनो हाथों को दुआ में उठाती रही।


छोड़ कर गया वो राह तकती रही,
देर तक वो रोती सिसकती रही,
एक दिन तो आ जाना मेरे लाडले,
हर साँस में आस एक पलती रही।


याद में पुत्र की साँसे चलती रही,
आत्मा भी मिलन को तड़पती रही,
अन्तिम समय आ गया जानकर...
आँसुओ से चिट्ठी वो लिखती रही।


-
मेरे लाल जान ले मजबूरी मेरी-
उम्र भर जिस चेहरे से तूने नफ़रत करी,
एक रोज बचाने तूझे आग से...
जल गई थी ये सूरत मेरी।


खुद जलकर भी खुद को बचाती रही,
अपनी आँखों से दुनियाँ दिखाती रही,
मै खुश हूँ मै हर पल तेरे साथ थी,
तेरी आँखों मे मै सदा मुस्काती रही।


खत पढ़ा पढ़कर आँखें ही रोती रही,
आत्मा पुत्र की माँ को बिलखती रही,
जब तक माँ थी मै समझा नही...
इन आँखो से माँ दुनियां दिखाती रही।


माँ जैसी भी हो मेरे लाडलो,
जन्म जिसने दिया न नफ़रत करो,
सौ जन्मों में भी क्या चुका पाओगे,
कर्ज दूध का अदा क्या कर पाओगे,

बन कर लहू को रंगो में बहा...
कतरा-कतरा क्या उसको कर पाओगे-?


सुनीता चोटिया (शानू)

Thursday, January 3, 2008

तस्वीर तुम्हारी


-दिल के कोरे कागज पर-

-खींचकर कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें-

-जब देखती हूँ...

-बन जाती है तस्वीर तुम्हारी-

-और लगता है कागज़ का वह टुकड़ा-

-कह रहा हो मुझसे-

-मै तो बसा हूँ दिल में तुम्हारे-

-क्यों कागज पर उतारा है?

-देखो बेरहम दुनियाँ जला न दे-

-देखो कहीं हवा उड़ा न दे-

-और घबरा कर मै समेट लेती हूँ-

-वो तस्वीर तुम्हारी....


-जब सुबह का सूरज-

-अपनी रौशनी फ़ैलाये-

-मेरी खिड़की से झाँकता है-

-मुझे नजर आते हो तुम-

-अपनी इन्द्र-धनुषी बाँहे फ़ैलाये-

-और मेरे चेहरे से छूती-
-तुम्हारी बाँहे-

-जगा देती है मुझे-

-तुम्हारे अहसास के साथ-

-सचमुच तुमसे मिलकर जिन्दगी-

-एक कविता बन गई है-

-और मै एक कलम-

-जो हर वक्त-

-तुम्हारे प्यार की स्याही से-

-बनाती है तस्वीर तुम्हारी...।
सुनीता(शानू)

Monday, December 31, 2007

हैप्पी न्यू ईयर एक हॉस्य-कविता

हमने कहा जानेमन,हैप्पी न्यू ईयर...
हँसकर बोले वो,सेम टू यू माई डियर॥

पर पहले बस इतना बतलाओ,
आज नया क्या है समझाओ...

नये साल पर ही करती हो,मीठी-मीठी बातें...
चलो रहने दो हमको चूना मत लगाओ॥

कब मिली है हमको बिरयानी
अपनी तो वही रोटी और दाल है
सब कुछ तो है वही पुराना,
फ़िर भी कहती हो नया साल है॥

अच्छा छोडो़ बेकार की बातें
कुछ बात करो क्लीयर,
तुम भी मनाऒ जश्न अपना
क्या हमें भी लेने दोगी बीयर॥



नये साल का जश्न
कुछ ऎसा हम मनायें
भूल कर सारे गिले-शिकवे
पडौसन को भी बुलायें॥

बीयर तक तो श्रीमान की
बात समझ में आई
मगर पडौसन को बुलाने की
कैसी शर्त लगाई?

फ़िर भी दिल पर काबू करके
पोंछे हमने टियर्स,
देकर हाथ में चाय का प्याला
बोले उनको चियर्स॥



रहने दो जश्न नये साल का
हमे महंगा बहुत पड़ेगा
एक जश्न की खातिर तुमको
ऑवर टाईम करना पड़ेगा॥

फ़िर भी आज घर मॆ
सत्यनारायण पूजा हम करवायेंगे
पडौस वाली तुम्हारी बहन को
चाय भी जरूर हम पिलायेंगे



नही मनाना हमे नया साल
रहने दो डियर
टकरायेंगे चाय के प्याले
और कहेंगे चियर्स...



सुनीता(शानू)

नववर्ष आप सब की जिंदगी को सात रगों से सजायें
सात सुरों
की सरगम सा ये जीवन महक-महक जाये...

Monday, November 26, 2007

जिन्दगी कुछ ठहर सी गई...

दोस्तों आयोजन के इस चक्कर में जिन्दगी कुछ ठहर ही गई है...कुछ खुशीयाँ आपके साथ बाँटना भूल गई थी...अभी कुछ समय पूर्व (२ नवम्बर) को मेरे ब्लोग का जिक्र राजस्थान पत्रिका मे हुआ था इसके बाद(४ नवम्बर)मेरी एक रचना अमर उजाला में प्रकाशित हुई थी...मेरे लिये ये बेहद खुशी की बात थी मगर मै आपके साथ इसे बाँट ना पाई... आशा करती हूँ आप सभी का प्यार व स्नेह हमेशा मिलता रहेगा...






सुनीता(शानू)

अंतिम सत्य