चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Tuesday, April 8, 2008

धरती का गीत


धरती पर फ़ैली है,सरसों की धूप-सी
धरती बन आई है, नवरंगी रूपसी ॥


फ़ूट पड़े मिट्टी से सपनों के रंग
नाच उठी सरसों भी गेहूं के संग।
मक्की के आटे में गूंथा विश्वास
वासंती रंगत से दमक उठे अंग।


धरती के बेटों की आन-बान भूप-सी
धरती बन आई है,नवरंगी रूपसी॥


बाजरे की कलगी-सी, नाच उठी देह
आँखों में कौंध गया, बिजली-सा नेह।
सोने की नथनी और, भारी पाजेब-
छम-छम की लय पर तब थिरकेगा गेह।


धरती-सी गृहणी की,कामना अनूप-सी
धरती बन आई है, नवरंगी रूपसी॥


धरती ने दे डाले अनगिन उपहार,
फ़िर भी मन रीता है,पीर है अपार।
सूने हैं खेत और, खाली खलिहान-
प्रियतम के साथ बिना जग है निस्सार।


धरती की हूक उठी जल-रीते कूप-सी
धरती बन आई है नवरंगी रूपसी॥

सुनीता शानू

किस पर किया विश्वास


ऎक कविता के माध्यम से कुछ कहना चाहा है...देखिये सफ़ल भी हुई हूँ कि नही...

फ़िर चली आँधी कि
उड़ चले पत्ते सभी
चरमराया पेड़ ऒ
कुछ डालियाँ भी टूटे तभी


चीं-चीं, चीं-चीं की चीत्कार
जब फ़ैली आकाश में
हो गई तत्काल गुम
किसी अविश्वास में

जैसे गिरा घोंसला उसका
टूट गया विश्वास तभी
टूट गये बंधन के धागे
और मोह के पाश सभी


क्रन्दन तब करती गौरैय्या
थक निढाल होकर बोली
ए आश्रयदाता बतला दे
तूने क्यों ये करी ठिठोली

आश्रय का वादा देकर
मुझे बुलाया था कभी
एक जरा सी आँधी से
भूल गया तू बात सभी


सुनीता शानू

Wednesday, April 2, 2008

एक गज़ल



अब ये रस्में-मोह्ब्ब्त भुला दीजिये
उनके ख्वाबों को दिल से हटा दीजिये




अश्क आँखों में देकर ये कहते हैं वो
चाहतों को भी अपनी भुला दीजिये


कल ही महफिल में रुसवा किया था हमें
अब वो कहते है हमको वफ़ा दीजिये


अपने ही जिस्म में अब न लगता है मन
उनके दिल को कोई घर नया दीजिये


और कब तक कोई राह देखे भला
जिस्‍म को खाक में अब मिला दीजिये



सुनीता शानू

Thursday, March 27, 2008

पलकें बंद हो गई...


आँखों ने आँखों से कह दिया सब कुछ

मगर जुबाँ खामोश रही...

जब दिल ने दिल की सुनी आवाज़

धड़कन खामोश रही...

आँखो के रास्ते दिल में उतरने वाले

ऎ मुसाफ़िर

अब बाहर जा नही सकते

तुम्हारे प्यार की खुशबू से तृप्त

उठती गिरती साँसे देख कर

अब पलके बंद हो गई...

सुनीता शानू

Monday, March 24, 2008

एक कविता....

दोस्तों कल एक कविता सुनाने का मौका मिला ...आपके सामने प्रस्तुत है...


आज़ादी की होली

पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानों ने होली


आज सजा है सर पे उनके बलिदानो का सेहरा
चाँद सितारों से मिलता है नादानों का चेहरा
आँख में आँसू आ जाते है देख के सूरत भोली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


महक उठी है आजादी हर धड़कन हर साँस में
छा गई है मस्ती एसी आज़ादी की आस में
नया सवेरा लाने निकली परवानो की टोली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


मर कर भी जिन्दा रहते है देश पे मिटने वाले
सर पर बाँध कफ़न आये है आज़ादी के मतवाले
आज लगा दी सबने अपने अरमानो की बोली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


आज चले है माँ के प्यारे देश की आन बचाने
जान हथेली पर ले आये आजादी के परवाने
हँसते-हसँते चढ़े फ़ाँसी पर हिम्मत भी न डोली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


सुखदेव,भगत सिंह,राजगुरू ने जो दिया बलिदान
ऋणी रहेगा सदा तुम्हारा सारा हिन्दुस्तान
नमन उन्हे है जिन वीरो ने खेली खून की होली
पहन वसन्ती चोला निकली मस्तानो की टोली
आजादी की खातिर खेली दिवानो ने होली


सुनीता शानू

Saturday, March 22, 2008

फ़ागुन आया झूम के...

दोस्तों होली का त्यौहार आप सबके जीवन में खुशियाँ लाये यही मनोकामना है...

भंग की तरंग

ढोलक और मॄदंग

होली के रंग

नाचे संग-संग .....




फ़ागुन के दोहे


डाल-डाल टेसू खिले,आया है मधुमास,
मै हूँ बैठी राह में,पिया मिलन की आस।
हो रे पिया मिलन की आस



फ़ागुन आया झूम के ऋतु वसन्त के साथ
तन-मन हर्षित हों रहे,मोदक दोनो हाथ
हो रे मोदक दोनो हाथ



मधुकर लेके आ गया, होठों से मकरंद
गाल गुलाबी हो गये, हो गई पलकें बंद।
हो रे हो गई पलकें बंद



पिघले सोने सा हुआ,दोपहरी का रंग
और सुहागे सा बना,नूतन प्रणय प्रसंग
हो रे नूतन प्रणय प्रसंग



अंग-अंग में उठ रही मीठी-मीठी आस
टूटेगा अब आज तो तन-मन का उपवास
हो रे तन-मन का उपवास



इन्द्र धनुष के रंग में रंगी पिया मै आज
संग तुम्हारे नाचती , हो बेसुध बे साज
हो रे हो बेसुध बे साज



तितली जैसी मैं उड़ू चढ़ा फ़ाग का रंग
गत आगत विस्मृत हुई,चढी नेह की भंग
हो रे चढ़ी नेह की भंग



रंग अबीर गुलाल से,धरती भई सतरंग
भीगी चुनरी रंग में,हो गई अंगिया तंग
हो रे हो गई अंगिया तंग



गली-गली रंगत भरी,कली-कली सुकुमार
छली-छली सी रह गई,भली भली सी नार
हो रे भली-भली सी नार



सुनीता शानू




Friday, March 7, 2008

मै और तुम

एक औरत और नदी में क्या अन्तर है?
क्या उसका अपना अस्तित्व बाकी रहता है समुन्दर रूपी पुरूष से मिलकर ?

क्या विवाह के बाद भी वह, वह रह पाती है जो पहले थी?
क्यों उसे ही बदलना पड़ता है, यहाँ तक की जन्म से जुड़ा नाम तक बदल जाता है...





-मै और तुम-

-बँध गये हैं एक अदृश्य बंधन में...

-कितने शान्त और गम्भीर हो तुम-

-समन्दर की तरह...

-और मै शीतल,चँचल,-

-बहती नदी सी-

- बहे जा रही हूँ निरन्तर...

-और तुम मेरी प्रतिक्षा में खड़े हो-

-अपनी विशाल बाहें फ़ैलाये-

-मेरे आते ही तुम्हारी भावनाये-

- हिलोरे लेने लगती है-

-लहरों की तरह-

-और मुझे सम्पूर्ण पाकर...

-हो जाते हो शान्त तुम भी-

-मै जानती हूँ...

-मै अब तक मै ही हूँ-

-किन्तु...

-जिस दिन तुमसे मिल जाऊँगी-

-तुम बन जाऊँगी-

सुनीता शानू



Thursday, February 14, 2008

वेलन्टाईन डे...

वेलन्टाईन डे पर संत वेलनटाईन को मेरी श्रद्धांजली....


रोक सकेगा कौन इन्हे
ये आंधी और तूफ़ान है
चल रहे है भेड़ चाल ये
आजकल के नौजवान है...

पहले पहल ये परफ़्यूम देकर
अपना प्यार दिखाते है
किस डे पर भी किस देकर
सबसे प्यार जताते है
हग डे पर भी गले मिलकर
बन जाते है अपने से
वेलन्टाईन डे पर इनके
पूरे हो जाते है सपने

प्यार घूमाना प्यार फ़िराना
प्यार ही इनका मुकाम है
रोक सकेगा कौन इन्हे
ये आँधी और तूफ़ान हैं

बीत गया समय पुराना
आज चलन है इनका
भूल गये सब रिश्ते-नाते
नया दौर फ़ैशन का
गर्ल फ़्रेंड की जी हुजूरी
यही कर्तव्य है इनका
एक छूटी दूजी बनाई
यही धर्म है इनका

माँ की डाँट पिता का पहरा
इनके लिये अपमान है
रोक सकेगा कौन इन्हे
ये आँधी और तूफ़ान है

बालो पर जो हाथ घुमाये
वो माँ इन्हे न भाती है
अनुशासन की सीख दे
वो बात इन्हे सताती है
कैसे गुरू कहाँ का चेला
सब बने संगी-साथी है
जैसी दिक्षा वैसी शिक्षा
सब गुड़-गौबर-माटी है

खुशी मनाएं वेलन्टाईन की
जिसने दिया बलिदान है
रोक सकेगा कौन इन्हे
ये आँधी और तूफ़ान है...

सुनीता शानू

Sunday, January 27, 2008

कुछ पुरानी यादें...

कुछ पुरानी यादें...धूमिल न हो जाये...आईये ले चले कुछ हँसने -हँसाने...
आज हम भी कोशिश करते है ... तस्वीरे क्या बोलती है...

कौन कहता है कि मुझमे लचक नही...
मुसाफ़िर भाई ध्यान से कहीं कमर में झटका न आ जाये...:)




खलिश भाई यह आपके लिये ही है...


देखिये तस्वीर अच्छी आनी चाहिये...:)




गुरूदेव प्रणाम!







न न न गुरूदेव से पंगा हर्गिज नही...





नही वापिस न दें आपके लिये ही है...



राजीव भाई अब आपके साथ पंगा कौन लेगा...



जाने आपने क्या जादू किया है नीलिमा जी सब हँस रहे है...


अगर कमर में दर्द है तो पहले बताते न विनोद भाई...:)







माईक दूर रहने से आवाज सही नही आती...:)





घबरा मत अक्षय बेटा अच्छी तरह से पढ़ यहाँ किसी को कविता याद नही है सब देखकर पढेंगे...:)




कैसी बातें करते है आप भी कविता हाथ में है मगर देख नही रहा...:)





मेरे तो हाथ में बहुत तेज़ दर्द हो गया रात भर कविता लिखते-लिखते


हम किसी से कम नही है भैया देख लेना...






न न न ससुर जी से मजाक नही


रे निखिल क्या सारी डायरी आज ही पढोगे?


मै भी सुना ही दूँ क्या एक कविता...





समझ नही आ रहा क्या लिखा है...:)


क्षमा गुरूदेव

क्या सुनना पसंद करोगे?



यहाँ भी पंगा...:)




यह माईक मुझे बेहद पसंद है...


ध्यान से सुनिये...


एक और कविता की गुजारिश है...



हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कृपया तालियाँ अवश्य बजायें


क्षमा करें संतोष जी


गुरूदेव आपके काव्य-पाठ में पटाखे क्यूँ छोड़े जा रहे थे?






देखा आपका भी जवाब नही कुँवर साहब...आपकी आवाज ने सबको बाँध दिया

Sunday, January 20, 2008

ओह! भूल गया

दोस्तो रोजमर्रा की जिन्दगी में कहीं आप भी कुछ भूले तो नही? अगर लगता है कुछ भूल रहे है तो हो सकता है याद आ ही जाये आपको भी... एक छोटी सी पेशकश है...


-घर से ऑफ़िस-
-ऑफ़िस से घर-
-आते जाते-
-हमेशा भूल जाता हूँ...
-मगर आज सब याद है-
-बेटा ये लो तुम्हारा चॉकलेट-
-ठीक है न-
-मुन्नी तुम्हारी गुड़ीया भी-
-और तुम्हारी यह लाल साड़ी-
-हाँ लाल ही लानी थी न...
-देखा...मुझे सब याद है-
-है न-
-बेटा.... बहुत दिनों से दर्द है-
-अब सहन नही होता-
-क्या आज डॉक्टर से अपाईंटमेंट ले लिया...?
-ओह्ह! .....बाबूजी... आज फ़िर भूल गया-
-मेरी याददास्त को जाने क्या हो गया है...

सुनीता शानू
-

Wednesday, January 9, 2008

माँ की व्यथा

दोस्तों मेरी यह कविता १३ तारीख को रेडियो द्वारा राष्ट्रीय प्रसारण दिल्ली केंद्र से प्रसारित होगी...रेडियो या अखबार जिसे शायद आज सब भूल गये हैं मगर हर खासोआम के दिल तक पँहुचता है आज भी रेडियो और अखबार...:) ... कृपया आज ही खरीद कर लाईये एक छोटा सा रेडियो और सुनिये आपके प्रिय कवि की दर्द भरी कविता...:)

देख कर लाल की खूबसूरत छवि,
मन ही मन बावरी मुस्काती रही,
डर न जाये कहीं मेरा लाडला...
मुँह आँचल से अपना छिपाती रही।


मगर एक दिन ये हवा जो चली,
ले उड़ी आँचल वो पकड़ती रही,
देख कर लाल तो डर ही गया...
मै माँ हूँ... तेरी वो बताती रही।


पोंछ कर आँसू आँखे छिपाती रही,
खुद को नजरों से खुद की गिराती रही,
आँसूओं लग न जाये बददुआ लाल को,
दोनो हाथों को दुआ में उठाती रही।


छोड़ कर गया वो राह तकती रही,
देर तक वो रोती सिसकती रही,
एक दिन तो आ जाना मेरे लाडले,
हर साँस में आस एक पलती रही।


याद में पुत्र की साँसे चलती रही,
आत्मा भी मिलन को तड़पती रही,
अन्तिम समय आ गया जानकर...
आँसुओ से चिट्ठी वो लिखती रही।


-
मेरे लाल जान ले मजबूरी मेरी-
उम्र भर जिस चेहरे से तूने नफ़रत करी,
एक रोज बचाने तूझे आग से...
जल गई थी ये सूरत मेरी।


खुद जलकर भी खुद को बचाती रही,
अपनी आँखों से दुनियाँ दिखाती रही,
मै खुश हूँ मै हर पल तेरे साथ थी,
तेरी आँखों मे मै सदा मुस्काती रही।


खत पढ़ा पढ़कर आँखें ही रोती रही,
आत्मा पुत्र की माँ को बिलखती रही,
जब तक माँ थी मै समझा नही...
इन आँखो से माँ दुनियां दिखाती रही।


माँ जैसी भी हो मेरे लाडलो,
जन्म जिसने दिया न नफ़रत करो,
सौ जन्मों में भी क्या चुका पाओगे,
कर्ज दूध का अदा क्या कर पाओगे,

बन कर लहू को रंगो में बहा...
कतरा-कतरा क्या उसको कर पाओगे-?


सुनीता चोटिया (शानू)

Thursday, January 3, 2008

तस्वीर तुम्हारी


-दिल के कोरे कागज पर-

-खींचकर कुछ आड़ी-तिरछी लकीरें-

-जब देखती हूँ...

-बन जाती है तस्वीर तुम्हारी-

-और लगता है कागज़ का वह टुकड़ा-

-कह रहा हो मुझसे-

-मै तो बसा हूँ दिल में तुम्हारे-

-क्यों कागज पर उतारा है?

-देखो बेरहम दुनियाँ जला न दे-

-देखो कहीं हवा उड़ा न दे-

-और घबरा कर मै समेट लेती हूँ-

-वो तस्वीर तुम्हारी....


-जब सुबह का सूरज-

-अपनी रौशनी फ़ैलाये-

-मेरी खिड़की से झाँकता है-

-मुझे नजर आते हो तुम-

-अपनी इन्द्र-धनुषी बाँहे फ़ैलाये-

-और मेरे चेहरे से छूती-
-तुम्हारी बाँहे-

-जगा देती है मुझे-

-तुम्हारे अहसास के साथ-

-सचमुच तुमसे मिलकर जिन्दगी-

-एक कविता बन गई है-

-और मै एक कलम-

-जो हर वक्त-

-तुम्हारे प्यार की स्याही से-

-बनाती है तस्वीर तुम्हारी...।
सुनीता(शानू)

Monday, December 31, 2007

हैप्पी न्यू ईयर एक हॉस्य-कविता

हमने कहा जानेमन,हैप्पी न्यू ईयर...
हँसकर बोले वो,सेम टू यू माई डियर॥

पर पहले बस इतना बतलाओ,
आज नया क्या है समझाओ...

नये साल पर ही करती हो,मीठी-मीठी बातें...
चलो रहने दो हमको चूना मत लगाओ॥

कब मिली है हमको बिरयानी
अपनी तो वही रोटी और दाल है
सब कुछ तो है वही पुराना,
फ़िर भी कहती हो नया साल है॥

अच्छा छोडो़ बेकार की बातें
कुछ बात करो क्लीयर,
तुम भी मनाऒ जश्न अपना
क्या हमें भी लेने दोगी बीयर॥



नये साल का जश्न
कुछ ऎसा हम मनायें
भूल कर सारे गिले-शिकवे
पडौसन को भी बुलायें॥

बीयर तक तो श्रीमान की
बात समझ में आई
मगर पडौसन को बुलाने की
कैसी शर्त लगाई?

फ़िर भी दिल पर काबू करके
पोंछे हमने टियर्स,
देकर हाथ में चाय का प्याला
बोले उनको चियर्स॥



रहने दो जश्न नये साल का
हमे महंगा बहुत पड़ेगा
एक जश्न की खातिर तुमको
ऑवर टाईम करना पड़ेगा॥

फ़िर भी आज घर मॆ
सत्यनारायण पूजा हम करवायेंगे
पडौस वाली तुम्हारी बहन को
चाय भी जरूर हम पिलायेंगे



नही मनाना हमे नया साल
रहने दो डियर
टकरायेंगे चाय के प्याले
और कहेंगे चियर्स...



सुनीता(शानू)

नववर्ष आप सब की जिंदगी को सात रगों से सजायें
सात सुरों
की सरगम सा ये जीवन महक-महक जाये...

Monday, November 26, 2007

जिन्दगी कुछ ठहर सी गई...

दोस्तों आयोजन के इस चक्कर में जिन्दगी कुछ ठहर ही गई है...कुछ खुशीयाँ आपके साथ बाँटना भूल गई थी...अभी कुछ समय पूर्व (२ नवम्बर) को मेरे ब्लोग का जिक्र राजस्थान पत्रिका मे हुआ था इसके बाद(४ नवम्बर)मेरी एक रचना अमर उजाला में प्रकाशित हुई थी...मेरे लिये ये बेहद खुशी की बात थी मगर मै आपके साथ इसे बाँट ना पाई... आशा करती हूँ आप सभी का प्यार व स्नेह हमेशा मिलता रहेगा...






सुनीता(शानू)

Wednesday, November 21, 2007

लिजिये प्रस्तुत है कवि गौष्ठी के कुछ विडियो



विडियो से हमारा ब्लोग खुल नही रहा था इसीलिये
हमने हटा दिये है....


आप सभी को यह जानकर खुशी होगी कि आप सभी के सहयोग से हमारी गौष्ठी सफ़ल रही...और उन्हे मै कैसे भूल सकती हूँ प्रतीक शर्मा जी होशंगाबाद से जिन्होने नेट पर इस काव्य-गौष्ठी को प्रसारित करने में हमारी मदद की...कुछ इन्टरनेट की परेशानी वश मैं विडियो अपलोड नही कर पाई थी...मगर निराश न हो हाजिर है आप सभी के लिये कार्यक्रम की एक रिपोर्ट...






इस सम्मेलन की शाम जो रौनक बन कर आये...उन सभी की मै तहेदिल से कृतज्ञ हूँ...




संजय गुलाटी मुसाफ़िर जी ने किया कार्यक्रम का शुभ-आरम्भ...मगर उन्होने बहुत सोच-समझ कर राकेश जी के सम्मानित हाथों में सौपं दिया....






अभिनंदन समारोह






और अब राकेश जी के पुण्य हाथो से शुरुआत हुई हमारे कार्यक्रम की...

सबसे पहले हुआ राकेश जी द्वारा संचालन
और विनोद पाराशर जी का काव्यपाठ


महेश चंद्र गुप्त जी(खलिश) ने भी समा बांध दिया ...

राजीव तनेजा जी को हम कैसे भूल सकते है....पहला काव्य पाठ किया था उन्होने...

और नन्हा कवि अक्षय चोटिया क्या बात है


अजय जी आज आप गज़ल गाना भूल गये शायद....खैर बहुत सुन्दर कविता ने सभी को खुश कर दिया...

अविनाश वाचस्पति जी और पवन चंदन जी को हम दो नाम एक शख्स समझा करते थे...
बहुत सुन्दर सुनाया आप दो ने...

दिनेश रघुवंशी जी बहुत ही सुन्दर गीतकार है
उनका यहाँ आना हमारे लिये खुशी की बात थी और आपके साथ ज्योति कलड़ा जी का भी हार्दिक अभिनन्दन करते है...


अरे पंगेबाज से हमने पंगा नही लिया था...अरूण भाई आपका नाम तो समीर भाई ने लिया था...मगर आपकी कविता भी सबके मन को भा गई...
जिन्हे सुनने के लिये आप बेताब है लिजिये मिलिये सभी के प्रिय हमारे गुरुदेव समीर लाल जी


और हमने भी सुना ही दी एक कविता...अरे नही नही हमे तो विशेष डिस्काउंट मिला था ३ कवितायें सुनाने का...:)


सजीव जी की कवितायें भी उन जैसी ही सजीव है...


निखिल और शैलेश एक उभरता हुआ सितारा...आप सभी आशीर्वाद दे हम सभी को...


मोहिन्दर भाई क्या कहने....

अन्त मे परम आदरणीय हमारे गुरू के भी गुरु...
राकेश जी आपकी ही प्रतिक्षा में हैं हम सभी...


महफ़िल तो रौशन हो चुकी है मगर वो शक्स कहाँ है जो परवान हुई इस महफ़िल को समय की सीमा में बाधँ सके...
एक बार फ़िर आये कुँवर बेचैन साहब सभी की बेचैनी कम करने...


आप सभी का कोटि-कोटि आभार...

http://www.youtube.com/shanoo03

इस लिन्क पर जाकर आप अपनी कविता सुन सकते है

सुनीता(शानू)


Wednesday, November 14, 2007

सादर-अभिनंदन

आप सभी जिन्होने इस कवि-गौष्ठी को सफ़ल बनाने में मेरा साथ दिया है मै हृदय से नमन करती हूँ,

और बहुत से लोग जो नेट पर हमे देख सुन रहें थे उनका भी हार्दिक अभिनंदन करती हूँ,किसी भी कार्य की सफ़लता में कुछ बातें जरूरी होती है....विश्वास,लगन,और गुरूजनो का आशीर्वाद....यही इस कार्यक्रम की सफ़लता का राज है...मुझे आप सब पर और खुद पर पूरा विश्वास था और गुरूजनो का आशीर्वाद हमारे साथ था...तो कैसे न होती कामयाबी....मुझे बहुत से लोगो की व्यक्तिगत टिप्पणीयाँ मिली है मगर मै जानती हूँ उन पर आप सभी का हक है ...अतः यहाँ प्रकाशित कर रही हूँ....



कविता के सागर से निकली संवेदनाओं की खुश्बू मुझ तक पहुंची। बधाई। छोटी-छोटी कोशिशें कितना बड़ा काम कर जाती हैं, इतिहास हमें इनके उदाहरण देता है। यह आयोजन भी आने वाले दिनों में उसी इतिहास का हिस्सा होगा। कविता में बदलाव के सारे बड़े संदभॆ ऐसे ही छोटी-छोटी पगडंडियों से गुजरते हैं। समय सारी कोशिशो को अपने रजिस्टर में लिखता रहता है। ऐसे दौर में जब महानगरों में अतिथि के सत्कार से पहले उससे होने वाले ळाभ गिनने की रवायत चल रही हो, इस तरह के आयोजन को धारा के विपरीत एक जरूरी कोशिश के तौर पर दजॆ किया जाना चाहिए। हिंदी भाषा और हिंदी भाषी समाज दोनों पर अपने समय से पीछे चलने का आरोप है। तकनीकी से परहेज और कूप-मंडूक होने के तकॆ अक्सर दिए जाते हैं। लेकिन कमाल है साहब, हिंदी और तकनीकी के संगम ने होशंगाबाद, अमेरिका और दिल्ली सबको एक जगह जुटा दिया। मैं आप सब के लिए सिफॆ एक लफ्ज लिखना चाहूंगा-

जिंदाबाद।।।।

-प्रताप सोमवंशीस्थानीय संपादक,

अमर उजाला हिंदी दैनिक, ८९ इंडस्टियल

एस्टेट कानपुर


एक श्रोता एसे भी थे जो फोन पर ही कवि-गौष्ठी का आनंद ले रहे थे...


सुनीता जी नमस्कार,
मै कई दिनों से आपके घर होने वाले आयोजन की प्रतिक्षा कर रहा था,आज मैने इन्टरनेट के माध्यम से आपके आयोजन में जुड़ने की काफ़ी कोशिश की किंतु नाकामयाब रहा.तब मुझे एक उपाय सूझा,मैने सीधे आपके दिये हुए टेलिफोन पर नम्बर लगाया,जिन सज्जन ने फोन उठाया उनसे मैने कवि सम्मेलन सुनने की ख्वाहिश अर्ज की जिसे उन्होने स्वीकार कर लिया...और इस तरह मुझे फोन पर कवि सम्मेलन सुनने का मौका मिला.

मै ज्योति अरोड़ा जी के पहले काव्यपाठ कर रहे कवि की कविता अधूरी सुन पाया,अतः टिप्पणी नही कर सकूँगा.ज्योति जी की रचनायें सुनी,उनमें नयोचित कोमलता के साथ एक दबा हुआ सुप्त ज्वालामुखी अपनी पूर्ण ऊष्मा और ऊर्जा को संजोये परिलक्षित होता है

ज्योति जी के बाद संजीव जी का गीत सुबह के शीतल पवन झकोरों से उठती ताजगी का एहसास दे गया,वरिष्ठ गीतकार कुअर बेचैन तो जीवन्त किवंती (लिविंग लीजेण्ड) है-समकालीन समग्र भारतीय साहित्य की एसी निधी -जिसने शब्दो को अपने इशारों पर नचाया है और उन्हे जनसामान्य के समेकित सरोकारों को प्रतिध्वनित करने के लिये विवश किया है,समीर जी की कविता उनकी व्यापक सोच का सार्थक प्रतिबिम्बन करने में और साधारण सी अभिव्यक्तियों में छुपी कविता को निरायास अनावृत करने में कामयाब रही हैं

राकेश जी की रचनायें उनके विराट साहित्यिक व्यक्तित्व के अनुरूप रहीं.


आयोजन की सूत्रधार सुनीता(शानू) की कविता के नये तेवर जहाँ एक ओर नव-समाज की वैचारिक बारिकियों,प्ररुतियों और मनोदशा के नये सिरे से विश्लेष्णात्मक पड़ताल करते हैं वहीं दूसरी तरफ़ अपने बौध्विक दायित्वों से भी नावाकिफ़ नही हैं,वास्तव में व्यंग्य का उध्देश्य हँसाने की अपेक्षा मर्म पर चोट करने का ज्यादा है और इस लक्ष्य की प्राप्ति में सुनीता जी की रचना प्रेम का प्रमाणपत्र एक सफ़ल रचना हैं.


शेष रचनाकारों को मै सुन नही पाया लेकिन उम्मीद है कि उनकी रचनाओं ने भी कवि सम्मेलन की ऊँचाईयां प्रदान की होगी, इस सफ़ल आयोजन हेतु आपको कोटिशः बधाइयां.

भवदीयः

आनन्द कृष्ण, जबलपुर.



आप सभी को जिस रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार है बह कुछ ही दिनो में आप विडियो सीडी के द्वारा देख और सुन सकेंगें....

सुनीता(शानू)

Thursday, November 8, 2007

कृपया ध्यान दिजियेगा...

आप सभी कवियों व श्रोताओ को सूचित किया जाता है कृपया आयोजन स्थल का पता नोट कर लें सभी के ई मेल एड्र्स नही आये है अतः मेरे लिये बहुत मुश्किल है आप सभी को बता पाना...जिनके है उन्हे मेल की जा सकती है मगर बाकि लोग पता व फोन नम्बर नोट कर लिजिये...

मंगलमय हो दीपो की माला
आप खुशियाँ खूब मनायें
भूली-बिसरी व्यर्थ की बातें
दिल से आज हटायें
गायें गीत नया ही कोई
छेड़े नया तराना
बस इतना है नम्र निवेदन
मुझको भूल न जाना

आप सभी को दीपावली बहुत-बहुत मुबारक हो...

Wednesday, November 7, 2007

निवेदन

सभी ब्लॉगर भाईयों,बहनो,दोस्तों.... से अनुरोध है अपना ई-मेल पता व फोन नम्बर शीघ्र दे दें..
जो लोग काव्य गोष्ठी में आ रहे है उनके नाम कल आ गये थे...और भी आना चाहते है तो आपका स्वागत है...
http://shanoospoem.blogspot.com/2007/11/blog-post_06.html


सुनीता(शानू)


Tuesday, November 6, 2007

कवियों और श्रोताओं के नाम...

आदरणीय हो सकता है कि फ़िर कोई गलती हो गई हो...माफ़ी चाहती हूँ...मै जिनके नाम लिख रही हूँ उन्होने अपनी उपस्थिती दर्ज करवा दी है...मगर जो संकोच वश नही करवा रहे है वो भी आमंत्रित है...अगर कोई गलती से अभी भी लिस्ट में रह गये हो बुरा न माने आप सभी सादर आमंत्रित है...

कवि + श्रोता

१.राकेश खंडेलवाल जी
२.समीर लाल जी
३.प्रत्यक्षा जी
४.डॉ.व्योम जी
५.महेश चंद्र खलिश जी
६.विजेंद्र एस विज जी
७संगीता मनराल जी
८.आलोक पुराणिक जी
९.अविनाश वाचस्पति जी
१०.नीरज दीवान जी
११.अरूण अरोड़ा जी
१२.सजीव सारथी जी
१३.अजय यादव जी
१४.भुपेंद्र राघव जी
१५.पवन चंदन जी
१६.चिराग जैन जी
१७.विनोद पाराशर जी
१८.अक्षय चोटिया जी
२०.सुनीता(शानू)
२१.अमित कुमार जी( दहिया बाद्शाह पोयट्री क्लब )
२२.विंग कमांडर प्रफ़ुल बक्षी जी
२३.कवि दिनेश रघुवंशी जी
२४.कवि सुनील जोगी जी(अभी पक्का नही)
२५.जज राजकुमार जी
२६.रिपुदमन जी(अभी पक्का नही)
२७.संजय गुलाटी जी मुसाफ़िर
२८.प्रो. अरविंद चतुर्वेदी जी

30.मोहिन्दर जी
३१.निखिल आनंद गिरी


श्रोता

१.राजीव तनेजा जी
२.राजीव अविवाहित
३.मैथिली जी
४.शैलेश जी
५.कमलेश मदान जी
६.सृजन शिल्पी जी
७.नीरज शर्मा जी
८.राजेश रोशन जी
९.मसिजीवी जी
१०.नीलीमा जी
११.सुजाता जी
१२.अतुल जी
१३.रंजना भाटिया जी
१४.जगदिश भाटिया जी
१५. रमेश जी
१६.विनोद बहल जी
१७.संदीप कपूर ओम जी
१८.मीनू जी
१९.अविनाश जी मौहल्ला
२०.अमित जी
२१.यशवंत जी

२२.महेन्द्र जी
२३. बालकिशन जी
२४.पारुल
२५.पुनित ओमर

कृपया जिन लोगो का नाम याद नही आ रहा है वे भी आयें...
सभी कवि श्रोता भी है अतः यह न सोचे कि श्रोता कम है...


आप सभी लोगो से अनुरोध है मुझे अपना ई मेल एड्रस अवश्य दे दें...ताकि मै आप सभी को मेरा फोन नम्बर व आयोजन स्थल का पता दे सकूं...

कृपया जिन बंधुँओ को जानकारी है लाईव ब्रोडकास्ट की कृपया मदद करें मुझे इस बारे में ज्यादा जानकारी नही है...क्यों कि बहुत से लोग दूर है और चाहते है समीर भाई और राकेश भाई के साथ हमारी गोष्ठी...तो कृपया वो लोग मदद करें और आगे आयें...

सादर

सुनीता(शानू)

Sunday, November 4, 2007

लिजिये प्रस्तुत है आमंत्रित कवियों और श्रोताओ की लिस्ट

जैसा कि मैने अपनी पिछली पोस्ट में लिखा था,कि ४ तारीख तक आप सब मुझे अपना नाम कवि या श्रोता के रूप में दर्ज करवा दें...तो अभी तक जिन लोगो ने अपना नाम ई-कविता , अनुभूति व हिन्द-युग्म गुगलसमूह मेल के जरिये प्रेषित किया है , और जिन्होने चिट्ठे पर आकर दर्ज करवाया है
सभी के नाम मै यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ...आशा करती हूँ वह सब समय पर पहुँच जायेंगे...आप सब को मै व्यक्तिगत मेल के जरिये अपना पता व फोन नम्बर दे दूँगी...कृपया जिन आदरणीय के ईमेल पते चिट्ठे पर नही है वह मुझे भेज दें...ताकी मै आपको आने का पता दे सँकू...वैसे तो प्रताप नगर मेट्रो स्टेशन है आराम से पहुँचा जा सकता है फ़िर भी कौन किस और से आयेगा इसका ध्यान रखकर एक नक्शा बनाया जायेगा...मै आप सब को यथा समय मेल कर दूँगी....

बहुत से लोग अभी भी अपने आने का दर्ज नही करवा पाये है उन सबसे निवेदन है एक-दो दिन में जल्द बता दें...आप समझिये मेरी परेशानी को
...आप सब के आने का पक्का होने पर ही सभी के खाने का प्रबंध हो पायेगा...सबकी पसंद की व्यवस्था होगी वेज /नान वेज...तो कितने लोगो की व्यवस्था करनी है इसमे आप अपनी आमद लिखवा कर मेरे साथ सहयोग किजिये...आपकी अति कृपा होगी...
कहीं ऎसा न हो की बैठने की कुर्सी कम पड़ जाये...जगह बहुत है मगर सीट उतनी ही लगवाई जायेगी जितने लोग आयेंगे... बाहर से आने वालो को अगर वो रूकना चाहते है तो अपने ठहरने कि व्यवस्था खुद ही करनी होगी...



आने वाले कवियों मे मुख्य है
.....................................................


राकेश खंडेलवाल जी
समीर लाल जी
प्रत्यक्षा जी

विजेंद्र एस विज जी
संगीता मनराल जी
महेश चंद्र गुप्त जी


संजय गुलाटी मुसाफ़िर जी
अविनाश वाचस्पति जी
नीरज दीवान जी


सजीव सारथी जी
अजय यादव जी
बी राघव जी

पवन चंदन जी
अक्षय चोटिया (ग्यारह साल का कवि)


श्रोता गण...
..................

मैथिली जी
अरूण अरोड़ा जी
शैलेष जी
कमलेश मदान जी
सृजन शिल्पी जी
नीरज शर्मा जी
राजेश रोशन जी
राजीव कुमार जी (अविवाहित)
पवन चंदँन जी


इसके अलावा कुछ मान्यवर एसे है जिन्हे मै बुलाना चाहती हूँ मगर वो आ नही पा रहे...या तो वो दूर है या मजबूर है...कुछ ने मेरे चिट्ठे पर टिप्पणी भी की है...
उनसे अनुरोध करती हूँ भविष्य में एक बार जरूर आने का कष्ट करें...इस वक्त मै ज्यादा जोर नही दे सकती क्योंकि यह दिपावली का पर्व है सभी व्यस्त भी होते है...

जिनके नाम इस प्रकार से है...

सारथी जे सी फिलिप
कवि कुलवन्त जी
संजीव तिवारी जी
संजीत त्रिपाठी जी
अफ़लातून जी
संजय भाई पटेल जी
संजय बेगानी जी
हर्षवर्धन जी
आशीष जी
महाशक्ती जी
पंकज अवधिया जी
दीपक भारतदीप जी
घुघूति जी
अनिता कुमार जी
मीनाक्षी जी
आशा जी
ममता जी
इन सब का नाम मैने दूसरी काव्य गौष्ठी के लिये रिजर्व कर लिया है तब कोई भी बहाना नही चल पायेगा...:)


फ़ुर्सतिया जी,हरिराम जी आलोक पुराणिक जी,जगदिश भाटिया जी मसिजीवी,मौहल्ला, अतुल जी,अरविन्द चतुर्वेदी जी,नीलिमा जी, सुजाताजी,रचना जी,काकेश जी, अमित जी,और मेरे हिन्द-युग्म के सभी सदस्य...क्या बात है भाई किस बात पर नाराज है आप सब...और बहुत से एसे लोग है जिनका नाम शायद मै भूल रही हूँ कृपया याद दिलायें...भूलने के लिये माफ़ी चाहती हूँ

आप सभी का सहयोग अपेक्षित है...मेलजोल की भावना हमे आपस में एक सूत्र में पिरोये रख सकती है...कृपया आप सीधे मेरे ब्लोग पर सम्पर्क करें कि आप अवश्य आ रहे है...



सुनीता(शानू)

अंतिम सत्य