चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Tuesday, May 1, 2012

सेवा सम्पादक

गुगल से साभार तस्वीर बच्चे की ही मिल पाई :)







मुझे देख कर वो मुस्कुराता है
पानी रख धीरे से पूछता है
चाय?
मै भी उसकी मुस्कुराहट की
अभ्यस्त सी हो चली हूँ
मुझे भी इंतजार रहता है कि
अब वो मुस्कुरायेगा
चाय या कॉफ़ी कुछ कुछ
कहेगा अवश्य
मेरी हाँ सुनकर
वह एक बार फिर मुस्कुराता है
सैंडविच या कुछ औरले आऊँ
अटक-अटक कर कुछ शब्द
फ़ूटते है उसके मुह से
और मै ना चाहते हुए भी कह देती हूँ
नही बस चाय।
स्निग्ध कोमल सी मुस्कुराहट
चेहरे पर चस्पाये
चल देता है वो बाहर
कभी-कभी लगता है
कितना आवश्यक है
उसका होना
एक भी दिन उसका आना
मेरी सोच से परे होगा
हाँ शायद-
कुछ प्यास लगी है
चाय मिल जाती अगर
साथ सैंडविच चलेगी
कुछ खाया भी नही सुबह
आवाज लगाती हूँ
श्याम
ओह्ह सॉरी आज वह छुट्टी पर है J

Friday, April 13, 2012

ऎ कामवाली तुम्हे बस कामवाली ही बने रहना है...


google se sabhar



हल्लो कौन!
घरवाली?
नही मै कामवाली….
खट
और कनैक्शन कट
लेकिन मै जानती हूँ तुम्हारी उपयोगिता
सच कहूँ
तुम्हारे होने से
घरवाली का ठाठ-बाठ
उसका सजना सँवरना हो पाता है
नख से शीश तक सजी-धजी वह
डरती है 
तुम कहीं अवकाश न ले लो
तुम् अपने सिर दर्द, बदन दर्द की 
परवाह किये बिना
दो कप चाय पीकर
लगा देती हो सिर में तेल
मल देती हो कमर भी

गुदड़ी में छिपे लाल सी
खूबसूरती तुम्हारी
छिपी रहती है
बेतरतीब उलझे बालों और
मैली कुचैली पेबंद लगी साड़ी
या पसीने से उठती दुर्गंध
के बीच
मगर फिर भी
कुछ भी आपत्तिजनक नही होता
लेकिन हाँ
भूल कर भी मत चली आना
केश संवार कर
या इस्त्री किये कपड़े पहन कर
काम से हटा दी जाओगी
इर्ष्यावश या भयवश

घरवाली के सौंदर्य का खयाल रख तुम्हें
बने रहना है पूर्ववत
कामवाली तुम्हे बस काम से मतलब रखना है
तुम्हारा पति 
तुम्हारे बच्चे 
तुम्हारा सजना सँवरना
शाम होने और दिन निकलने के
बीच का मामला है
तुम जानती हो

बेचारी, गरीब, अनपढ़
सभी नाम तुम पर फ़बते हैं मगर,
पढ़ी-लिखी खूबसूरत जवान कामवालियाँ
शिकार हो जाती हैं
किसी की हवस का
या फ़िर रह जाती हैं बेरोजगार

सुनो!
तुम्हारी ढकी-छुपी अप्रतिम सुंदरता
बन सकती है तुम्हारी दुश्मन
ये मैली कुचैली साड़ी,
तुम्हारे चारों तरफ़ लिपटी ये पसीनें की दुर्गंध
रक्षाकवच है तुम्हारा
इस आवरण से निकल कर
झाँकने की कोशिश भी
तुम्हे कामवाली रहने नही देगी
लेकिन
तुम फ़िक्र मत करो
घर का बचा खाना
मेरे और बाबूजी के पुराने कपड़े
बच्चों के पुराने कपड़े और खिलौने
सब दूँगी तुम्हे
पगार भी बढ़ा दूँगी मगर
ऎ कामवाली 
तुम्हे बस
कामवाली ही बने रहना है...

Thursday, April 12, 2012

भूल जाईये बीते कल को आगे बढ़ना ही नियति है...




कृपया क्षमा करें कुछ मित्रों को मुझे परेशान देख बहुत दुख हुआ। रोना धोना और चिल्लाना मेरी यह फ़ितरत भी नही अतः यह कविता यहाँ से हटा रही हूँ...

Wednesday, March 28, 2012

सागर में दो दिन डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय में...


दोस्तों कुछ समय पहले  ( 15 जनवरी  2012) डॉ हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय में एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में शिरकत करने का मौका मिला। कुछ व्यस्तता थी अतः पहले पोस्ट नही कर पाई।

कवियों की इस जमात में जाने-माने दिग्गज विद्यमान थे.. सबसे बीच में जो नजर आ रहे हैं वे सोम ठाकुर जी हैं और कुर्सी  पर विट्ठल भाई पटेल और सबसे पहले अलबेला जी के साथ मै।







विट्ठल भाई पटेल जी के बारे में जितना कहा जाये कम होगा।




ये है विट्ठल भाई की तस्वीरें जो उनकी गाथा खुद गा रही हैं...

विट्ठल भाई पटेल जी के यहाँ सचमुच बहुत अच्छा लगा एक ऎसी शख्सियत जिसे कोई भुला नही सकता




अंत में अलबेला जी तथा हरी सिंह गौर युनिवर्सिटी के सचिव संतोष तिवारी सहगोरा जी का आभार जिन्होनें मुझे इस आयोजन में हिस्सा लेने का अवसर प्रदान किया।

सुनीता शानू

Friday, January 20, 2012

चाय चाय चाय ! और कोई काम ही नही.?

यह है चाय....

बहुत दिन से सभी एक ही शिकायत कर रहे हैं शानू जी कुछ लिखते ही नही आप और मुझे... सच्ची में चाय के अलावा कुछ काम नही। सारे दिन इसको चाय भिजवानी है उसको भिजवानी है चाय की टेस्टिंग करनी है। अपुन तो पगला गये। मेरा ब्लॉग भी आजकल गाना गा रहा है सूना-सूना लागे.... पर मै भी क्या करूँ ये चाय मुझसे तो छूटती ही नही.. हाहहह आप पक्का मुझे चाय की नशेड़ी बोल देंगें:) 

खैर पच्चीस दिसम्बर को पिलानी में कवि सम्मेलन हुआ। 

सबसे खूबसूरत बात तो यह थी की उस कवि सम्मेलन में मेरे माता-पिता को सादर-सम्मान पूर्वक बुलाया गया था। मेरे लिये इससे बड़ी बात कोई नही थी। कवि सम्मेलन तो बहुत हुए लेकिन मेरे माता-पिता का होना मेरे लिये सबसे बड़ी बात थी।

पिलानी बहुत ही खूबसूरत शहर है। पिलानी मेरी जन्म-भूमि जहाँ मै पली बड़ी हुई  और आज भी मन अटका है मेरी पिलानी में। जब कभी जाना होता है ट्रेन से लेकर घर तक सब  अनजाने चेहरे भी जाने-पहचाने लगने लगते हैं। 

आईये आज थोड़ी बहुत पिलानी की सैर कर ही ली जाये...

यह सरस्वती मंदिर का मुख्य द्वार है
अरे रे यह हाथी को देख कर यह मत समझ लीजियेगा की हम मायावती का समर्थन कर रहे हैं। ऎसे तो हाथों पर दस्ताने भी नही हैं भई कांग्रेस का समर्थन भी तो नही न है....:)


मै इन जनाब की चाची हूँ और यह खड़े हैं शिव-गंगा मंदिर के सामने

बहुत ही खूबसूरत जगह है यह शिव-गंगा नहर जो एक बार चला जाये बार-बार जाने का मन हो जायेगा।

हर्षवर्धन बिड़ला जी और मै...
पिलानी का नाम पहले दलेल गढ़ था सुना है कि पिलानी नाम बिड़लो का ही दिया गया है। बिड़ला जी ने वैसे पिलानी की रूपरेखा ही बदल दी है।  मुझे तो बस इतना याद है कि हर्षवर्धन बिड़ला जी की हवेली में हम छुपछुपाई खेला करते थे...जब मै दस साल की थी...:)

कड़ाके की ठण्ड और हम बेचारे कवि...:)
कवियों की दशा क्या आपसे छुपी हुई है। इतनी तेज़ ठण्ड में स्टेज़ पर बैठा देना।  ऎसे में क्या कविता निकलती है? अब बताओ ये अलबेला जी न होते तो इन बीच वाले कवियों का क्या होता। मै तो क्या है पिलानी की हूँ इतनी सर्दी नही लगती भई लेकिन जो बाहर से आये थे...कुछ तो सोचो उनके बारे में...

लो जी तस्वीर देख कर ही आप सब समझ गये होंगे... अब जरा एक कप चाय हो जाये.. 

सुनीता शानू
  

Saturday, September 17, 2011

मन को मनाने के अंदाज निराले है


बस एक छोटी सी कोशिश...


मन को मनाने के अंदाज निराले है
हुए नही वो हम ही उसके हवाले हैं

उसने कसम दी तो न पी अभी तक
हाथ में पकड़े लो खाली प्याले है

दिल की बात जुबां पर लाये भी कैसे
ये भीड़ नही बस उसके घरवाले हैं

बात छोटी सी भी वो समझे नही
चुप रहेंगे भला जो कहने वाले हैं

इन्तजार की भी होती है हद दोस्तों
रूक न पायेंगे हम जो मतवाले हैं॥


सुनीता शानू

अंतिम सत्य