चाय के साथ-साथ कुछ कवितायें भी हो जाये तो क्या कहने...

Saturday, September 29, 2007

तो फ़िर प्यार कहाँ है?


बहुत खुश थी वह
कि सब कितना प्यार करते है
कितना ख्याल रखते है

उसका
बाबूजी का चश्मा
जो अक्सर रख कर भूल जाते थे
या फ़िर उनकी कलम
सभी का ख्याल रखती थी

वो
पति को सम्भालना
सर दबाना,पैर दबाना
चाहे सारा दिन की कशमकश से थक गई हो

मगर
कभी मन भारी नही लगता था
बच्चो का प्यार तो भरपूर था
जैसे की भरा समुन्दर
जेब खर्ची बच्चे माँ से पाते थे
हर गलती पर
माँ का आँचल बचाता था

उन्हे
वह पेड़ की छाल ही नजर आती थी
जैसे की पेड़ कटने से पहले
हर मुसीबत
छाल को ही सहनी पड़ती है
मगर आज बरसों बाद
यह भरम भी टूट गया

जब
एक लम्बी बिमारी ने

अपना जामा पहना दिया
और वह टूट कर बिखर गई
चारपाई पर
कुछ दिन लगा
कि सभी कितना प्यार करते है
मगर एक दिन

शीशे सा मन टूट गया
आज वो समझी
यह प्यार नही था
वह सबकी जरूरत थी
हाँ शायद
इन्सान की कीमत
उसके बस काम से है
और फ़िर
उसने जाना...
बेकार,बेरोजगार,बीमार,लाचार इन्सान
किसी काम का नही

तो फ़िर प्यार कहाँ है?

मगर लगता है
मन के किसी कौने में
प्यार अभी बाकी है
क्या घर के नौकर सी बदतर है
औरत की जिन्दगी
क्या उसे परेशान देख कर
घर की आँखें रोती नही
हाँ सबकुछ था पास
मगर विश्वास कहीं खो सा गया था
कुछ न कर पाने पर
जब निराशा हावी हो जाती है
इन्सान की समझ पर
पर्दा गिर जाता है
और
उसके लिये परेशान आँखे
शायद
उसे अहसास दिलाती रहती है
कि आज
जब कोई तुझे पुकारता नही
तो लगता है प्यार नही
और वह पूछती है खुद से

तो फ़िर प्यार कहाँ है



Friday, September 28, 2007

भगत सिंह हमारा(गीत)


सारे जग में सबसे न्यारा
भगत सिंह हमारा...भगत सिंह हमारा
भारत माँ की आँखों का तारा
भगत सिंह हमारा...भगत सिंह हमारा

एक पंजाबी एसा जिसने
देश की खातिर जान लुटा दी
आज़ादी की खातिर जिसने
पल में सारी उम्र गँवा दी
वो सेनानी सबसे न्यारा
भगत सिंह हमारा...भगत सिंह हमारा

फ़ेंक असैम्बली में बम जिसने
अंग्रेज़ी हुकुमत को हिला दिया
छोटी सी उम्र में इन्कलाब ला
सोई रूहो को जगा दिया
सांडर्स की हत्या कर जिसने
फ़िरंगी को ललकारा
भगत सिंह हमारा...भगत सिंह हमारा

देश के खातिर मिट जाने को
एक पल भी न व्यर्थ गँवाया
हँसते-हँसते चढ़ा फ़ाँसी पर
शहीद भगत सिंह नाम कमाया
वो भी था एक बेटा प्यारा
भगत सिंह हमारा...भगत सिंह हमारा

अगर मिले जो जन्म कभी तो
भगत सिंह सा मिल जाये
देश के खातिर मर मिट जाये
अपनी कहानी लिख जाये
रहे सलामत गुलिस्ता हमारा
था जिसका एक ही नारा
भगत सिंह हमारा...भगत सिंह हमारा

सुनीता(शानू)

Friday, September 14, 2007

हम हिन्दी अपनायेंगे (हास्य-व्यंग्य)

मेरी यह कविता मेरे गुरूदेव के चिट्ठे का काव्यरूपांतरण है...बस यूं ही हँस दिजिये चलते-चलते...



कनाडा में रहने वाले हिन्दुस्तानियों ने,
हिन्दी-दिवस कुछ एसे मनाया...
माँ शारदा की मूरत के आगे,
दीप भारतीय एक जलाया...

भारत से आये एक अधिकारी को,
मुख्य अतिथी बनाया,
हिन्दी हमारी पहचान है कहके
हिन्दी का महत्व समझाया...

गर्मी के मौसम में अतिथी,
गर्म सूट पहन कर आये...
सुनकर भाषण हिन्दी में,
बहुत ही वो घबराये...

आया पसीना देख उन्हे जब,
आयोजक ने पंखा चलवाया...
चली हवा जब पंखें की,
दीपक थौड़ा सा टिमटिमाया...

आखिर अंग्रेजी हवा के आगे,
लौ थौडी़ सी लड़खड़ाई,
बोझिल नजरों से ताकती सी,
बुझ गई जैसे हो पराई...

फ़िर जलाया दीप किन्तु,
जल्द ही बुझा दिया,
माँ शारदा की मूरत को भी,
उठा बक्से में बन्द किया...

हुआ समापन हिन्दी-दिवस,
सबने सयोंजक को थैंक्यू कहा,
एक शब्द न था हिन्दी का,
हिन्दी पखवाड़ा खत्म हुआ...

फ़िर आयेंगे अगले साल,
हिन्दी-दिवस मनाने को...
हम भी है हिन्दी-भाषी,
बस इतना समझाने को...

अंग्रेजी मुल्क में रहकर भी,
दिल से हम हिन्दुस्तानी है,
बदल गये परिवेश हमारे,
सूरत तो जानी पहचानी है...

अंग्रेजो की नौकरी करते,
हिन्दी को घर मे कैसे रखते,
नमक जो खाते है अंग्रेजी,
नमक हरामी कैसे करते...

माना हम तो गैर मुल्क में
रहकर भी हिन्दुस्तानी है...
पर ए हिन्दुस्तां वालो,
तुम्हे हिन्दी से क्या परेशानी है...

हरिराम को तुम हैरी कहते,
द्वारिका दास अब डी डी है...
माँ जीते जी मम्मी बन गई,
पिता बने अब डैडी है...

क्यों अंग्रेजी सर उठा के
फ़टाफ़ट बोले जाते हो,
मातृभाषा के नाम से ,
क्यों इतना कतराते हो...

राजभाषा होकर भी
हिन्दी बनी नौकरानी है,
अंग्रेजी पराई होकर भी,
बनी भारत की रानी है...


आओ हिन्दी को अपनाएं
विश्वास ये अटल रहे
हिन्दी है राष्ट्रभाषा हमारी,
हिन्दी सदा अमर रहे...


हिन्दी सदा अमर रहे...

हिन्दी-दिवस पर आप सभी को हर्दिक शुभकामनाएं


सुनीता(शानू)

Wednesday, September 5, 2007

हास्य-कविता ये शिक्षक

सच ही कहा है गुरू बिन ज्ञान नहीं,
गुरू नहीं जब जीवन में मिलते भगवान नहीं
आज शिक्षक दिवस पर उन सभी गुरूओं को मेरा नमन जिन्होने निःस्वार्थ भाव से नन्हें, सुकोमल कच्ची मिट्टी से बने बच्चों का मार्ग दर्शन किया और उन्हें सही मार्ग दिखलाया...
मगर मेरी यह कविता उन शिक्षकों के लिये है जो स्वार्थवश अपने कर्तव्य भूल गये हैं...

ये शिक्षक

नहीं चाहिये हमें ये शिक्षा

अनपढ़ ही रह जायें....

एसे गुरूओं से भगवान बचाये


नकली डिग्री ले लेकर जो

गुरू बन बैठे हैं,

गलत ज्ञान को सही बता

घमंड में ऎंठे है

कैसे कोई झूठी आशा इनसे लगायें

एसे गुरूओं से भगवान बचाये



जैक और चैक के चक्कर में

शिष्य चुने जाते हैं

गरीब घर के बच्चे

न उच्च शिक्षा पाते हैं

गुरू ही जब व्यापारी बन जायें

ऎसे गुरूओं से भगवान बचाये


गुरू बने है सर आज

शिष्य बने स्टुडैंट है

मेरे भारत को बना के इडिया

बजा रहे बैंड हैं

गुरू वंदना, गुड मॉर्निंग कहलाये

ऎसे गुरूओं से भगवान बचाये


रक्षक ही भक्षक बन कर

शोषण बच्चों का करते हैं

वो गुरू भला क्या बनेंगे

जो गलत राह पर चलते हैं

बलात्कारी,अत्याचारी जब गुरू बन जायें

ऎसे गुरूओं से भगवान बचाये


गुरू नहीं जब गुरू द्रोण से

कैसे अर्जुन बन जाते

रामायण,गीता के बदले

हैरी-पोटर पढ़वाते

उल्टी बहती गंगा में सब नहायें

ऎसे गुरूओं से भगवान बचाये


सुनीता(शानू)


Tuesday, September 4, 2007

हे राधे-श्याम

आज जन्माष्टमी के अवसर पर आप सभी को हार्दिक शुभ-कामनाएं...आज मै ना आऊँ और ना लिखुं कुछ कैसे हो सकता है...बहुत व्यस्त हूँ मगर श्याम सखा के लिये हर्गिज नही...एक छोटा सा गीत लिखा है कभी मीरा बनके तो कभी राधा बन के हर रूप में साँवरे को चाहा है सभी ने... वो मुरली मनोहर न जाने कैसा जादू करता है कि उससे प्रेम करना भी बहुत सुहाता है सभी को...आईये जन्माष्टमी के इस अवसर पर हम सभी उस श्याम सखा को याद करें...

सुन सखी ओ चँचल नैना,

जागी न सोई मै सारी रैना,

रात सुहानी फ़िर वो आई,

आँखों में भी मस्ती छाई...

डाल गले बाहों का गहना,

हुए एक नैनो से नैना...

सुन सखी ओ चँचल नैना

जागी न सोई मै सारी रैना

रूप मनोहर श्याम सुन्दर वो

झुका जो धरती पे अम्बर हो

बाजे पायल खनके कंगना

चमकी बिजुरिया सारी रैना...

सुन सखी ओ चँचल नैना

जागी न सोई मै सारी रैना

मौन निमन्त्रण मेरा समर्पण

चिर निद्रा सा सुखद आलिंगन

समा गई मै उर बीच लता सी

पलक सम्पुटो में मदिरा सी

हुआ समर्पित प्रेम सुवर्णा

सुन सखी ओ चँचल नैना...

सुनीता(शानू)




Tuesday, August 14, 2007

अमर शहिदो के नाम




साठ साल के इस बूढे भारत में,
क्या लौटी फ़िर से जवानी देखो,

आजादी की खातिर मर-मिटे जो,

क्या फ़िर सुनी उनकी कहा्नी देखो...


कहाँ गये वो लोग जिन्होने,

आजादी का सोपान किया था,

लगा बैठे थे जान की बाजी,

आजाद हिन्दुस्तान किया था...


मेरे भारत आजाद का कैसा,

बना हुआ ये हाल तो देखो,

अमीर बना है और अमीर,

गरीब कितना फ़टेहाल ये देखो...


माँ बहन की अस्मत को भी,

सरे-आम नीलाम किया है,

बेकारी और भुखमरी ने,

अंतर्मन भी बेच दिया है...


क्या पाया क्या खोया हमने,

छूट रही जिन्दगानी देखो,

आतंकवाद और भ्रष्टाचार की,

बढ रही रवानी देखो...


अमर शहिदो की शहादत को,

आज ही क्यूँ याद किया है,

क्यूँ आज नही फ़िल्मी चक्कर,

जो राष्ट्र-गान को याद किया है...



शराब और शबाब में डूबे,

मचा रहे धमाल ये देखो,

किन्तु राष्ट्र-गान की खातिर,

तीन मिनट में बेहाल ये देखो...



अब भी जागो ए वतन-वासियो,

याद करो वो कुर्बानी,

जिस देश में एक दूजे की खातिर,

आँखों से बहता था पानी...



आज लहराये तिरंगा हम सब,

और तिरंगे की शान तो देखो,

आओ आजादी का जश्न मनाये,

अमर शहिदो के नाम ये देखो...





सुनिता(शानू)

Sunday, August 12, 2007

हास्य कविता


(इस तस्वीर से किसी को आपत्ति हो तो हटाई जा सकती है )

छः महिने की छुट्टी लेकर हम तो बहुत पछताये,
दो हफ़्ते में ही देखो लौट के बुध्दू घर को आये...

सिगरेट,कोकीन के जैसे ही ब्लागिन ने नशा चढा़या
इस ब्लागिन के चक्कर ने निकम्मा हमें बनाया...


जाकर ऑफ़िस में जब बैठे, लेखन का ही ध्यान रहा
बिजिनेस मीटिंग में भी ,कविता का ही भान रहा...

चाय के सब ऑडर हमने उलट-पलट कर डाले
मैनेजर,क्लर्क सभी को कविता पर भाषण दे डाले...

छोड़ काम-धाम सभी जब बैठे तुकबंदी करने
एक-एक कर लग गये सभी कविता लिखने...


कुछ ना पूछो भैया सबने कैसा हुड़दग मचाया
अच्छे खासे ऑफ़िस को कवि-बंदर-छाप बनाया...


दो हफ़्ते की इस दूरी ने कितना हमे रूलाया
भूले बिजिनेस हम ,जब ख्याल कविता का आया...


न जायेंगे अब छोड़ तुम्हे ए कविता,
कहते है गुड़ खाके...
रहे सलामत अपनी ब्लागिन
करें टिप्पणी बरसाके...


सुनीता(शानू)

Wednesday, August 1, 2007

अलविदा मित्रों

अलविदा दोस्तों आज मै आप सब लोगों से विदा लेती हूँ कुछ समय उपरांत मै अवश्य लौट कर आऊंगी आपकी हमारी इस छोटी सी दुनिया में मगर अब मुझे कुछ जरूरी काम करने हैं यही समय है जब मेरा चाय का बिजिनेस पुरे जोरो पर होता है...अतः अब मुझे ६ महिने का ब्लागर्स की दुनिया से अवकाश चाहिये...मै जानती हूँ मै आप सभी को बहुत miss करूंगी मगर मेरा एक कर्तव्य अपने पति और बच्चों के प्रति है,आप लोगो से बस एक निवेदन है मुझे भूल मत जाना मै फ़िर लौट कर आऊंगी...और हाँ अगर हो सका तो कविताओं पर कभी-कभार टिप्पणी अवश्य करूंगी...मगर मै 6 महिने तक कोई कविता नही लिख पाऊँगी.............

आपके प्यार और स्नेह के लिये बहुत-बहुत आभारी हूँ

आपकी सुनीता(शानू)

Tuesday, July 31, 2007

दिल फेंक आशिक




है दिल फेंक आशिक जमाने में बहुत,
अपने दामन को बचा कर रखिये।




न ठहर जाये अश्क आँखों में कहीं,
अपनी पलकों को झुका कर रखिये।




इश्क में मिलती है बस तनहाई यहाँ,
अपने दिल को गुलशन बना कर रखिये।




गम में रोना न पड़ जाये उम्र भर तुझको,
उस सितमगर को मेहमां बना कर रखिये।




बेवफ़ा हैं ये जमाने के रहनुमा सारे,
दिल के आईने में खुद को सजा कर रखिये।





ऎसा न हो लग जाये चोट दिल पर कोई,
अपने दिल को पत्थर सा बना कर रखिये।


बदनाम न कर दे दुनियाँ की जालिम नजरे,
खुद को दुनियाँ की से नजरों से बचा कर रखिये।




सुनीता शानू




Monday, July 30, 2007

है कौन जिसे प्यास नही है....



है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है,
जीने की किसे आस नही है...

प्यास जहाँ हो चाहत की,
जिन्दा दफ़नाएं जाते है,
हर दिल में मुमताज की खातिर,
ताज़ बनाएं जाते है...
विरान है वो दिल जिसमे मुमताज नही है
है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है,

प्यास जहाँ हो पिया मिलन की
वहाँ स्वप्न सजोंये जाते है
प्रियतम से मिलने की चाहत में
नैन बिछाये जाते है
प्यासे नैनो में आँसू की थाह नही है
है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है

प्यास जहाँ हो बस जिस्म की
दामन पे दाग लगाये जाते है,
कुछ पल के सुख की खातिर
हर पल रूलाये जाते है
माटी के तन की बुझती प्यास नही है
है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है

प्यास जहाँ हो दौलत की,
कत्ल खूब कराये जाते है,
अपने निज स्वार्थ की खातिर,
दिल निठारी बनाये जाते है...
खून बहा कर भी मिलती एक सांस नही है
है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है,

प्यास जहाँ हो शौहरत की,
रिश्ते भुलाये जाते हैं,
एक नाम को पाने की खातिर,
हर नाम भुलाये जाते हैं
भाई से भाई लड़े रिश्तों में आँच नही है
है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है

प्यास जहाँ हो वतन की,
वहाँ शीश नवाये जाते हैं,
धरती माँ के मान की खातिर,
सर कलम कराये जाते हैं
आज़ादी की रहती किसको आस नही है
है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है

है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है
जीने की किसे आस नही है॥


सुनीता(शानू)

Saturday, July 28, 2007

एक अजनबी




चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी
एक अजनबी अपना सा क्यूँ लगने लगा,
क्यूँ कोई दिल में आज मेरे धड़कने लगा…


किससे मिलने को बेचैन है चाँदनी,
क्यूँ मदहोश है दिल की ये रागिनी,
बनके बादल वफ़ा का बरसने लगा
एक अजनबी अपना सा क्यूँ लगने लगा



गुम हूँ मै गुमशुदा की तलाश में
खो गया दिल धड़कनो की आवाज़ में
ये कौन सांस बनके दिल में महकने लगा,
एक अजनबी अपना सा क्यूँ लगने लगा



हर तरफ़ फ़िजाओं के हैं पहरे मगर,
दम निकलने न पायें जरा देखो इधर,
जिसकी आहट पर चाँद भी सँवरने लगा
एक अजनबी अपना सा क्यूँ लगने लगा



रात के आगोश में फ़ूल भी खामोश है
चुप है हर कली भँवरा भी मदहोश है
बन के आईना मुझमें वो सँवरने लगा
एक अजनबी अपना सा क्यूँ लगने लगा




ना मै जिन्दा हूँ ना मौत ही आयेगी
जब तलक न तेरी खबर ही आयेगी
बनके आँसू आँख से क्यूँ बहने लगा,
एक अजनबी अपना सा क्यूँ लगने लगा




सुनीता(शानू)

Friday, July 20, 2007

क्यों आते है गम हर रोज






क्यों आते है गम
हर रोज
जिन्दगी में
क्योंकि तुम बुलाते हो,

मगर कैसे
कौन चाहेगा दुखी होना
गम से सराबोर जिन्दगी
किसे पसंद है

मगर यही सच है
तुम्ही बुलाते हो
याद रखते हो हर पल
पिता का वो चाँटा
जो लगाया था तुम्हारी नादानियों पर,
या गुरू की वो फ़टकार
जो कभी लगाई थी तुम्हारी शैतानियों पर,


मगर भूल जाते हो,
पिता के दुलार को,
गुरू के आशीर्वाद को,
जो दिया था कभी
तुम्हारी हर कामयाबी पर,


हर कड़वी बात याद रहती है
अपने अज़ीज की तरह
सोचो
जिससे इतनी चाहत है
हर पल अहसास है जिसका
वो भला क्यों नही आयेंगे

खड़े रहेंगे तुम्हारे दरवाजे पर
मेहमान बनकर
जब भी बुलाओगे
चले आयेंगे
आने का प्रयोजन
मै तुम्हारे हर पल साथ हूँ
तुम भी तो मुझे भूलते नही
खुशी के क्षणों में भी
तो मै बेवफ़ा कैसे हो सकता हूँ
जब भी बुलाओगे दौड़ा चला आऊँगा


और आना कैसा मै तो रहता हूँ
दिल में तुम्हारे
जरा गौर से देखो
गमों ने तुम्हारे दिल को छलनी कर दिया है
जैसे कि दीमक
मन की दिवारों को खा गई हो
आलस्य बढ़ता जाता है,
चारों और बेचारगी ओर तनहाई का आलम है


ये सब मेरे मित्र है
जब भी आता हूँ
इन्हे भी साथ ही लाता हूँ


इतना बेगैरत नही हूँ


"जब बुलाते हो
तब ही आता हूँ"

सुनीता(शानू)



Monday, July 16, 2007

चलिये थोड़ा हास्य हो जाये



ये कविता हास्य-व्यंग्य पर आधारित है
कृपया इसे अन्यथा ना लिया जाये हँसी के साथ पढ़ा जाये और हँसगुल्ले की तरह उड़ा दिया जाये...

कह रहे वृतान्त सारा,
सुन लिजे कान लगाय,
ब्लागर मिटवा में गुरूवर,
अब ना हम जा पाय।

अब ना हम जा पाय,
वहाँ बस होती टाँग खिंचाई,
मेल-मिलाप तो दूर ही समझो,
रिश्तों में भी चतुराई।

रिश्तों में भी चतुराई,
हमसे न देखी जाये,
हम ठहरे सत्संगी भैया,
कुछ भी समझ ना पाये।

कोई आये बनारस से,
तो कोई नाथ के द्वारे,
कोई आये गुजरात से,
तो कोई अहमदाबाद से प्यारे।

हम तो समझ न पाये,
क्यों होती गुटबन्दी,
चौबारे पर बैठके,
क्यों बाते करते मंदी।

क्यों बातें करते मन्दी,
फ़ुनवा को कान लगाय,
बातों में भी हेरा-फ़ेरी,
हम तो समझ न पाये।

आपस में परिचय कर,
बैठे सीट लगाये,
तभी एक कौने से,
वेटर जी आये।

एक दूजे की शकल देख-कर,
सब ही बहुत चकराये,
जब वेटरजी ने आकर,
सबको मीनू पकड़ाये।

झाँका-झाँकी शुरू हुई जब,
सब अपनी शकल छुपायें,
वेटर जी भी देख सभी को,
मंद-मंद मुस्काये।

मंद-मंद मुस्काये गुरूवर,
हम तो शर्म से गड़ ही जाय,
जैसे ही आये प्रबंधक,
सबने वेटर को दिये बताय।

कॉफ़ी पीकर जैसे ही हम,
बैठे कुछ सुस्ताने,
तभी पलायन किया जाये,
लगे सभी बतियाने।

क्या बतलाये हम तुमको.
सोच-सोच कर पछताये
यहाँ से वहाँ दौड़ लगाते,
बहुत ही हम शर्माये।


कलम दिवानी क्या करे,
कोई हमे समझायें,
बिन स्याही के भी देखों,
कैसन चलती जाये।


कैसन चलती जाय गुरुवर,
एसी मारे मार,
ढोल की पोल भी खोल दे,
अंटाचीत भी लाये।

छोड़ बात अधूरी प्रभुजी,
हमतो रहे सकुचाये,
सारा विवरण दे पाते,
वो शब्द कहाँ से लाएं।

गदहा लेखन का काम गुरुवर
तुमही रहे सिखलाये
एक ही गदहा लिखा था हमने
लिख कर हम पछताये

लिख कर हम पछताये,
आहत मित्र किये सभी
पढ़ हमारे गद्य को
हो गई कैसी तना तनी।

हो गई तना-तनी
हमको रहे समझायें
जो कर रहे मन-मौजी
उनको रहे टिपीयाये।

उनको रहे टिपीयाये गुरूवर,
हमसे ना देखा जाये,
तुम भी होगये पराये गुरुवर,
अब ना हम जा पायें।

सुनीता(शानू)

http://sanuspoem.blogspot.com/ का पूण विवरण)

Sunday, July 8, 2007

आधुनिक द्रोपदी (कृपया फ़िर पढ़े)

NARAD:Hindi Blog Aggregator


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी मुझे लगता है ये बहुत जरूरी है कि मै अपनी कविता के बारे में पहले आप सभी को कुछ निवेदन करूँ क्योंकि बहुत से मित्र-गण मेरी बात शायद ठीक से समझ नही पाये है...
...आज दुनिया में कितने लोग एसे है जो राम का नाम रख कर राम की भूमिका निभा रहे है...कितने लोग एसे है जो कृष्ण का नाम रख कर कृष्ण की भूमिका निभा रहे है...कृष्ण के जिस रूप से मै प्यार करती हूँ वो भगवान है मगर इस कविता में जिस रूप का वर्णन है वो सिर्फ़ एक नाम है... कृष्ण नही...यदि कोई कृष्ण भक्त यह कृष्ण का अपमान समझ रहा है तो मै उन सभी से विनती करती हूँ कृपया एसा ना समझे कृष्ण तो मेरे आराध्य है मै भला उनके लिये कुछ कैसे कह सकती हूँ ये उन लोगो के लिये कहा गया है जो सिर्फ़ नाम के कृष्ण है और जब द्रोपदी खुद ही निर्वस्त्र है तो ये नाम के कृष्ण भी क्या कर सकते है...आशा है आप अन्यथा न लेंगे...
मेरी यह कविता हास्य तो नही मगर व्यंग्य जरूर है आज के समाज पर, शायद अपने शब्दो से कुछ समझा ही पाऊँ…

एक गली के नुक्कड़ पर
खड़े हुए थे चार किशोर
मुरलीमनोहर,श्यामसुंदर,
माधव और नन्दकिशोर…

खड़े-खड़े होती थी उनमें
मस्ती भरी बातें,
रोज होती थी चौराहे पर
उनकी मुलाकाते…

तभी गुजरी वहाँ से
एक सुंदर बाला
चाल नशीली लगे कि जैसे
चलती-फ़िरती मधुशाला…

झाँक रहा था बदन
आधे कपड़ो में
जरा नही थी शर्म
उसके नयनो में…

देख प्रदर्शन अंगो का
हुए विवेक-शून्य किशोर
धर दबोचा एक पल में उसको
मचा भीड़ में कैसा शोर…

द्रोपदी ने गुहार लगाई
भूल गये तुम हे कन्हाई

कहा था तुमने हर जनम में,
तुम मेरी रक्षा करोगे
जो करेगा चीर-हरण द्रोपदी का
नाश उसका करोगे…

कृष्ण ने अट्टहास किया
द्रोपदी का उपहास किया…

है कहाँ वस्त्र अंगो पर
जो मै लाज बचाऊँ
तुम खुद ही वस्त्र-हीन हो
कहो कैसे चीर बढ़ाऊँ…

कहो कैसे चीर बढ़ाऊँ...

सुनीता(शानू)

Friday, June 29, 2007

हे अमलतास

हे अमलतास

तपती धरती करे पुकार,

गर्म लू के थपेड़ों से,

मानव मन भी रहा काँप

ऐसे में निर्विकार खड़े तुम

हे अमलतास।


मनमोहक ये पुष्प-गुच्छ तुम्हारे,

दे रहे संदेश जग में,

जब तपता स्वर्ण अंगारों में,

और निखरता रंग में,

सोने सी चमक बिखेर रहे तुम

हे अमलतास।

गंध-हीन पुष्प पाकर भी,

रहते सदा मुसकाते,

एक समूह में देखो कैसे,

गजरे से सज जाते,

रहते सदा खिले-खिले तुम

हे अमलतास

हुए श्रम से बेहाल पथिक,

छाँव तुम्हारी पाएँ,

पंछी भी तनिक सुस्ताने,

शरण तुम्हारी आयें,

स्वयं कष्ट सहकर राहत देते

हे अमलतास।

बचपन से हम संग-संग खेले,

जवाँ हुए है साथ-साथ,

झर-झर झरते पीले पत्तों सा,

छोड़ न देना मेरा हाथ,

हर स्वर्णिम क्षण के साथी तुम

हे अमलतास।

सुनीता(शानू)

Thursday, June 28, 2007

"ए दोस्त"

"ए दोस्त"

तुम जानते हो,

तुम्हारी हर बात,

मेरी जिन्दगी के,

मायने बदल देती है,

तुम्हारी हर बात,

प्रेरणा होती है,

उस पल,

जब मै अकेले में,

सिसक रही होती हूँ...

जिन्दगी से हार कर,

मै जानती हूँ,

उन विषम परिस्थितीयों में,

तुम कुछ भी नही कर सकते,

मेरे लिये,

और यह भी कि,

सहना ही पड़ेगा मुझको यह सब,

अकेले,

मगर फ़िर भी,

मुझे चाहत रहती है,

सदैव,

तुम्हारी उपस्थिती की,

तुम्हारी मौजूदगी की,

तुम्हारे होने का यह

"अहसास"

मुझमे चाहत भर देता है,

जीने की

और रास्ता बनाता है,

उन कठिन परिस्थितियों से,

उभर आने का,

सभंल जाने का...

Tuesday, June 26, 2007

दर्द का रिश्ता

NARAD:Hindi Blog Aggregator






तेरा मेरा रिश्ता,
लगता है जैसे...
है दर्द का रिश्ता,
हर खुशी में शामिल होते है,
दोस्त सभी
परन्तु
तू नहीं होता,
एक कोने में बैठा,
निर्विकार
सौम्य
मुझे अपलक निहारता
और
बॉट जोहता
कि
मै पुकारूँ नाम तेरा...
मगर
मै भूल जाती हूँ,
उस एक पल की खुशी में,
तेरे सभी उपकार,
जो तूने मुझ-पर किये थे,
और तू भी चुप बैठा
सब देखता है,
आखिर कब तक
रखेगा अपने प्रिय से दूरी,
"अवहेलना"
किसे बर्दाश्त होती है,
फ़िर एक दिन,
अचानक
आकर्षित करता है,
अहसास दिलाता है,
मुझे
अपनी मौजू़दगी का,
एक हल्की सी
ठोकर खाकर
मै
पुकारती हूँ जब नाम तेरा,
हे भगवान!
और तू मुस्कुराता है,
है ना तेरा मेरा रिश्ता...
लगता है जैसे,
दर्द का रिश्ता...

सुनीता(शानू)

Saturday, June 9, 2007

पतंग की डोर


एक डोर से बँधी मैं,
पतंग बन गई
दूर-बहुत-दूर...
आकाश की ऊँचाइयों को नापने,
सपनों की दुनिया में,
उड़ती रही...
इस ओर कभी उस ओर
कभी डगमगाई कभी सम्भली
फ़िर उड़ी
एक नई आशा के साथ,
इस बार पार कर ही लूँगी
वृहत् आकाश
पा ही लूँगी मेरा सपना
मगर तभी,
झटका सा लगा...
एक अन्जानी आशंका,
मुड़कर देखा
वो डोर जिससे बंधी थी
वो डोर जो मजबूत थी
बिलकुल मेरे
उसूलों
मेरे दायरों की तरह
फ़िर सोचा
तोड़ दूँ इस डोर को
आख़िर कब तक
बंधी रहूँगी
इन बेड़ियों में
जो उड़ने से रोकती हैं
कि सहसा
एक आह सुनी
डोर तोड़ कर गिरी
एक कटी पतंग की
जो अपना संतुलन खो बैठी
लूट रहे थे हज़ारों हाथ
कभी इधर, कभी उधर
अचानक
नोच लिया उसको
सभी क्रूर हाथों ने
कराह आई
काश! डोर से बंधी होती
किसी सम्मानित हाथों में
पूरा न सही
होता मेरा भी अपना आकाश
और मैं लौट गई
चरखी में लिपट गई
डोर के साथ

सुनीता चोटिया (शानू)

Saturday, June 2, 2007

कन्यादान





















इतिहास ने फ़िर धकेलकर,

कटघरे में ला खड़ा किया...

अनुत्तरित प्रश्नो को लेकर,

आक्षेप समाज पर किया॥

कन्यादान एक महादान है,

बस कथन यही एक सुना...

धन पराया कह-कह कर,

नारी अस्तित्व का दमन सुना॥

गाय, भैस, बकरी है कोई,

या वस्तु जो दान किया...

अपमानित हर बार हुई,

हर जन्म में कन्यादान किया॥

क्या आशय है इस दान का,

प्रत्यक्ष कोई तो कर जाये,

जगनिर्मात्री ही क्यूँकर,

वस्तु दान की कहलाये॥

जीवन-भर की जमा-पूँजी को,

क्यों पराया आज किया...

लाड़-प्यार से पाला जिसको,

दान-पात्र में डाल दिया॥

बरसों बीत गये इस उलझन में,

न कोई सुलझा पाये..

नारी है सहनिर्मात्री समाज की,

क्यूँ ये समझ ना आये॥

हर पीडा़ सह-कर जिसने ,

नव-जीवन निर्माण किया,

आज उसी को दान कर रहे,

जिसने जीवन दान दिया॥

सुनीता(शानू)


Sunday, May 13, 2007

मेरी माँ


मेरी माँ

माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है,
सारे जग में सबसे सुंदर,
माँ की मूरत क्यूँ होती है॥


जब नन्हे-नन्हे नाजु़क हाथों से,
तुम मुझे छूते थे...
कोमल-कोमल बाहों का झूला,
बना लटकते थे...
मै हरपल टकटकी लगाए,
तुम्हें निहारा करती थी...


उन आँखों में मेरा बचपन,
तस्वीर माँ की होती थी,
माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है॥


जब मीठी-मीठी प्यारी बातें,
कानों में कहते थे,
नटखट मासूम अदाओं से,
तंग मुझे जब करते थे...
पकड़ के आँचल के साये,
तुम्हें छुपाया करती थी...


उस फ़ैले आँचल में भी,
यादें माँ की होती थी...
माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है॥


देखा तुमको सीढ़ी दर सीढ़ी,
अपने कद से ऊँचे होते,
छोड़ हाथ मेरा जब तुम भी
चले कदम बढ़ाते यों,
हो खुशी से पागल मै,
तुम्हे पुकारा करती थी,



कानों में तब माँ की बातें,
पल-पल गूँजा करती थी...
माँ बनकर ये जाना मैनें,
माँ की ममता क्या होती है॥



आज चले जब मुझे छोड़,
झर-झर आँसू बहते हैं,
रहे सलामत मेरे बच्चे,
हर-पल ये ही कहते हैं,
फ़ूले-फ़ले खुश रहे सदा,
यही दुआएँ करती हूँ...



मेरी हर दुआ में शामिल,
दुआएँ माँ की होती हैं,...
माँ बनकर ये जाना मैने,
माँ की ममता क्या होती है॥


सुनीता(शानू)

अंतिम सत्य